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Surendra kumar singh

Abstract

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Surendra kumar singh

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तुम्हारे आगोश में

तुम्हारे आगोश में

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तुम्हारे आगोश में
 जीवन की नैसर्गिक आजादी की तरफ
प्रयाण का एक सिलसिला हैं मां ।
 सफर की मुश्किलों को
 जितनी सहजता से पार पा लिया था
आज उनकी याद मात्र से
 डर लगाने लगता है और
विस्मय से भर जाता हूं।
ये दुनियादारी का सम्मोहन भी
कितना विचित्र हैं मां ,
 हम अपने को ही स्वीकार नहीं कर पाते
 और लगता है विकास के आसमान मैं हैं।
जबकि मै देख रहा हूं अपने से थोड़ी ही
दूर डर का साम्राज्य
 विनाश की विभीषिका
दुनिया को एक बार फिर
 आग के गोले में तब्दील कर देने के
 मानवीय प्रयास और
उसे बचाए रखने के तुम्हारे प्रयास।


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