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Surendra kumar singh

Abstract

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Surendra kumar singh

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एहसास

एहसास

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तुम्हारे गहराते हुए एहसास
 और बढ़ती हुई नजदीकियों से
उत्पन्न हो रही आश्वस्तता में
जीवन के अस्तित्व के  अतिरिक्
 दुनिया में मेरे लिए तुम्हारे
तुम्हारे होने केआधार की तलाश में मैं
 कभी खुद को देखता हूं
कभी अपने प्रति लोगों की
धारणा को आकलन करता हूं
कभी शब्दों में शब्ददाता के ब्यौहार को देखता हूं
 और अभी तक तो इस निर्णय तक पहुंचा हूं कि
 तुम हो तो मैं हूं
पर अपने प्रयासों के प्रतिफल की गंध
अभी अदृश्य आश्वस्तता में घुली हुई पाता हूं
कुछ दृश्यमान भी होना चाहिए
 मेरे अजीज
खुली हुई आंखों से भी।


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