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Sonal Bhatia Randhawa

Abstract


5.0  

Sonal Bhatia Randhawa

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कपड़ों जैसे होते हैं रिश्ते

कपड़ों जैसे होते हैं रिश्ते

1 min 535 1 min 535

अक्सर कपड़ों जैसे 

होते हैं रिश्ते 

कुछ वक़्त की गर्द से 

हो जाते हैं मैले।

 

नए नए के ढेर में 

कुछ पुराने दब जाते हैं 

बंद रह जाते अलमारी में 

कुछ हो जाते तार तार।

 

घिस जाते हैं धीमे धीमे 

कुछ में रफ़ू लग जाते हैं 

कुछ यूँ ही फ़िक जाते हैं 

पैबंद लगा कर कुछ 

चलते रहते हैं।

 

कुछ नित धुल धुल कर 

उजले हो जाते हैं 

अक्सर कपड़ों जैसे 

होते है रिश्ते।

 

लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं 

जो बदन पर खाल के जैसे 

हमेशा को रह जाते हैं ! 


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