STORYMIRROR

Sonal Bhatia Randhawa

Abstract Inspirational

4  

Sonal Bhatia Randhawa

Abstract Inspirational

एक डॉक्टर की पुकार

एक डॉक्टर की पुकार

2 mins
288

युद्ध के मैदान में 

मैं शस्त्रविहीन खड़ा हूँ

फिर भी 

अनदेखे दुश्मन से 

लड़ने की ज़िद्द पर अड़ा हूँ


तुम्हें बचाने की 

कोशिश में मैं 

जी जान से लगा हूँ

घर जा नहीं सकता 

माँ बाप बीवी बच्चों को 

गले लगा नहीं सकता 


बस तुम्हारी साँसें चलती रहें 

इसी लिए रात रात जगा हूँ

तुम मारते हो पत्थर 

कभी देते हो मुझको गाली 

लहू टपकता है मेरा 

मगर फिर भी मैं


कर्तव्यपथ पर अडिग खड़ा हूँ

बेड नम्बर दो की 

ड्रिप नहीं चल रही 

तीन नम्बर वाले की 

पल्स नहीं मिल रही 

अरे सात वाले को 


ऑक्सिजन लगाओ

भाग भाग कर भी नहीं थका हूँ

छोड कर सब कुछ 

जो मैं बैठ गया घर में 

ना पैसा ना पावर 


ना मंत्री ना फ़िल्मी हीरो 

कोई भी ना बचा सकेगा तुम को 

क़दर करना सीखो यारों 

मैं ही ढाल बन तुम्हारी 

ज़िंदगी और मौत के बीच खड़ा हूँ !


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract