STORYMIRROR

मानव सिंह राणा 'सुओम'

Abstract

4  

मानव सिंह राणा 'सुओम'

Abstract

कहानी नई

कहानी नई

1 min
508

जिंदगी बन गई हैं कहानी नई

तूने जाना नहीं मैंने मानी नहीं

साथ लेकर चला है बहुत कुछ मगर

कुछ लाया नहीं कुछ ले जाना नहीं


देखो मस्त कैसा ये चलता रहा

वस्तुएँ देखकर के मचलता रहा

आज जीवन की डोर थमी सी लगे

कहानी बन गई हैं रूहानी नई

जिंदगी बन....


मौत है ये एक दिन जरूर आएगी

समझते रहे लेकिन समझे नहीं

ये हर रात है उसकी मानी भई

जिंदगी बन....


न ही साथ भाई नहीं कोई साथी

ये अंतिम पहर ये हैं अंतिम बाती 

अंतिम प्रवास है सबकी जानी भई

जिंदगी बन....


'सुओम' सोचता क्या यहाँ हमने पाया

क्या लाया था जो तू यहाँ दे पाया

मोह ममता का जीवन बिसारा नहीं

जिंदगी बन...


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract