मानव सिंह राणा 'सुओम'
Abstract
पाँच तत्व के शरीर में तन समय और साँस उधार हैं।
करता रहता है घमंड चीजों का नहीं कुछ सुधार है।
सब आये हैं प्रभु की मर्जी यहाँ कुछ समय गुज़ारने,
इस जगत, इस शरीर के लोगों हम तो किरायेदार हैं।
शहीद
सनातन का संगम
क्यूँ जलाते ह...
इतिहास रच डाल...
हमारी दिल्ली ...
मंजिले अभी और...
किरायेदार
माँ के चरण
जौहर का दर्द
जौहर की वेदना
रूह बन जाते हैं यों कुछ खास लोग, फिर कहाँ सफ़र अधूरा वो रख पाते हैं। रूह बन जाते हैं यों कुछ खास लोग, फिर कहाँ सफ़र अधूरा वो रख पाते हैं।
इतनी सी अरज है "नीरज" की, मेरे बजरंगी के प्यारे चरणों में। इतनी सी अरज है "नीरज" की, मेरे बजरंगी के प्यारे चरणों में।
वो जहां पर असमा और धरा मिल जाते हैं छोर मिलते ही नहीं पर साथ में खो जाते हैं। वो जहां पर असमा और धरा मिल जाते हैं छोर मिलते ही नहीं पर साथ में खो जाते हैं।
प्रतीक जीवंत हो उठे हैं और जीवंतता इतिहास की तरफ सरक रही है. प्रतीक जीवंत हो उठे हैं और जीवंतता इतिहास की तरफ सरक रही है.
जन-गण-मन से निकला स्वर है हिन्दी राष्ट्र धरोहर है।। जन-गण-मन से निकला स्वर है हिन्दी राष्ट्र धरोहर है।।
बिखर गई चहूँ ओर थोपी हुई हर विचारधारा बिखर गई चहूँ ओर थोपी हुई हर विचारधारा
कल्पवृक्ष के समान हमारी हर इच्छाओं को पूरी करते कल्पवृक्ष के समान हमारी हर इच्छाओं को पूरी करते
आत्मनिर्भर हो सब क्षेत्र पर आत्मविश्वास से भरी आत्मनिर्भर हो सब क्षेत्र पर आत्मविश्वास से भरी
सरल सहज सी हिन्दी भाषाओं की रानी है। सरल सहज सी हिन्दी भाषाओं की रानी है।
उम्र भी बढ़ रही धीरे-धीरे, ना जवानी फिर से आएगी। उम्र भी बढ़ रही धीरे-धीरे, ना जवानी फिर से आएगी।
गांधी को गढ़ने से पहले खुद को तो जरा गढ़ लीजिए, गांधी को गढ़ने से पहले खुद को तो जरा गढ़ लीजिए,
कलकल बहती नदी की जलधारा और साथ में थे। कलकल बहती नदी की जलधारा और साथ में थे।
हरियाली प्राणों की बंजर बिन प्रहार जब चुभते खंजर हरियाली प्राणों की बंजर बिन प्रहार जब चुभते खंजर
सच झूठ से ऊंचा, फिर भी सच का उड़ता मज़ाक, सच की खामोशी को दबा रहा है झूठ की आवाज़, सच झूठ से ऊंचा, फिर भी सच का उड़ता मज़ाक, सच की खामोशी को दबा रहा है झूठ की आ...
चंपी करते हुए ख्याल आया जीवन का, हर रोज़ संवारती हूँ, निखारती हूँ। चंपी करते हुए ख्याल आया जीवन का, हर रोज़ संवारती हूँ, निखारती हूँ।
छुपे मुझमें ही कहीं बनकर मेरी एक अनलिखी_कविता। छुपे मुझमें ही कहीं बनकर मेरी एक अनलिखी_कविता।
जैसा बोलेंगे वैसा लिखेंगे जैसा लिखेंगे वैसा पढ़ेंगे। है कोई ऐसी अन्य भाषा ? जैसा बोलेंगे वैसा लिखेंगे जैसा लिखेंगे वैसा पढ़ेंगे। है कोई ऐसी अन्य भाषा ?
जाने कितनी धारणाएँ जो निर्मित है मन के बारे में अंततः मन स्वीकार्य होगा। जाने कितनी धारणाएँ जो निर्मित है मन के बारे में अंततः मन स्वीकार्य होगा।
उम्र भर मैं कविता लिखती रही कभी कुछ तो कभी कुछ. उम्र भर मैं कविता लिखती रही कभी कुछ तो कभी कुछ.
जो पहुंचा अपने घर वो मजदूर हूँ हाँ मैं मजबूर हूँ। जो पहुंचा अपने घर वो मजदूर हूँ हाँ मैं मजबूर हूँ।