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मानव सिंह राणा 'सुओम'

Abstract

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मानव सिंह राणा 'सुओम'

Abstract

मंजिले अभी और भी हैं

मंजिले अभी और भी हैं

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परेशानियों के कई छोर भी हैं।

हताशा लिए वो कई और भी है।


नही ठहरो यहाँ चलते जाओ तुम।

समझो कि मंजिले अभी और भी हैं।


खुद को देख सदमा लिए बैठे हो

तुमसे गम में वो कई और भी है।


एक एक मोहल्ले में चर्चा है।

आँख नम लिए वो कई और भी है।


तुम्है देखकर'सुओम'हर आस जगी

रचनाकार यहाँ कई और भी है।



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