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स्त्री

स्त्री

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गलतियों का पुलिंदा है स्त्री

अपने ही फ़ैसलों पर शर्मिंदा है स्त्री।


घर की लक्ष्मी, आंगन की तुलसी

थक कर बैठी नहीं की बोझ है स्त्री।


कहने को समाज ने सशक्तिकरण कर दिया

आज भी, पुरुषों की मोहताज है स्त्री।


घर-परिवार के सुखों पर आँच ना आए इसीलिए

हर मुकाम पर दोहरी जिम्मेदारी निभाती है स्त्री।


ललाट पर सूरज, होठों पर मुस्कान सजा कर

समंदर सी पीर अंक में छुपाती है स्त्री।


उतनी उदास है नही जितना लिखती है

कलम के ज़रिए दरिया-ए-दर्द बहाती है स्त्री।।


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