STORYMIRROR

फकीर मन

फकीर मन

1 min
818


छोड़कर सड़कें सलीकों की

पगडंडी सा ऊबड़-खाबड़

हो जाना चाहता हूँ।


अपार्टमेंट, कॉम्प्लेक्स और

मॉल्स होकर थक गया

सन्नाटों में डूब

बीहड़ हो जाना चाहता हूँ।


गुलदानों में क्या रहना

बनावटी फूलों सा

इससे बेहतर

पतझड़ हो जाना चाहता हूँ।


बहुत कानून कायदे हैं

तेरे शहर में

तोड़ सब नियम

अक्खड़ हो जाना चाहता हूँ।


धन, दौलत, शोहरत

सब हो सिवा प्यार के,

छोड़ ऐसी जिंदगी

फक्कड़ हो जाना चाहता हूँ।।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Drama