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Sachin Kapoor

Others


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Sachin Kapoor

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धूप सी तुम

धूप सी तुम

1 min 455 1 min 455

तुम धूप हो

अपनी मर्ज़ी से 

आती हो 

और अपनी मर्ज़ी से 

चली जाती हो। 


अच्छा लगता है 

कभी गुनगुनी धूप

में बैठना

और कभी कभी 

कर देता हूँ खुद को

छांव के हवाले। 


जलाने लगती है 

कभी तपिश तेरी

फिर भी तेरे बिना 

मेरी हर सुबह अधूरी। 

चाहा, तुझे बांध लूं मुट्ठी में, 

पर क्या कोई मुट्ठी 

तुझे बांध पाई है?



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