फिर वही हुआ
फिर वही हुआ
खुश हो गई थी मैं आजकल कुछ दिनों से
मिली ही नहीं थी जो किसी से सदियों से ,
मैं उम्मीद कुछ ज्यादा लगाती गई थी उससे
यूं आमना सामना मेरा हुआ ही न था जिससे।
आज तक समझ ही ना पाई बस एक ही बात
क्या इतने ज्यादा मूल्यहीन थे, हैं मेरे जज्बात,
जो हर बार आने वाला मोल भाव करता है
और मैं कठोर बन जाऊं तो फिर मुकरता है।
एक शिकायत तो आज पापा से भी है मेरी
कि क्यों इतना कोमल दिल बनाया था मेरा,
कठोर पत्थर के जैसा यदि पिरोया होता इसे
तो बस के बाहर होता बनाना और का बसेरा।
आज रोना और सिर्फ रोना चाहता है मन मेरा
हर दर्द से परिचित हो गया है मेरा रोम रोम
आंसू आंखों के अंदर हैं, दर्द उभरता सीने में
दूसरे को रोशन करता जैसे जलता हुआ मोम।
