STORYMIRROR

नमी और मैं

नमी और मैं

1 min
524


एक हार थी

जिन्दगी मेरी

मुझे ना जाने क्यों

जिन्दगी मिल गई


टूट टूट के बिखरा हूँ

जमी पर मैं

ना जाने क्यो

मुझे नमी मिल गई


शहर को दोष नहीं

देता हूँ मैं

एक जान थी जो

शहर में कहीं खो गई


जीवन का कौन

सा वो मोड़ था

जिसमें मेरी सारी

ख़ुशी ग़म हो गई


ना जमी मिली ना

आसमा मिला

इश्क करके

मुझे एक अनजान

काफिला मिला


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy