STORYMIRROR

निखिल कुमार अंजान

Drama

3  

निखिल कुमार अंजान

Drama

नानी का घर

नानी का घर

1 min
327

ग्रीष्मकाल का अवकाश आते ही

मुझे ननिहाल बहुत याद आता है

माँ की भी माँ होती है वो जिसको

हम पर इतना सारा दुलार आता है।


जिसकी गोद मे कभी मेरी माँ पली बढ़ी थी

उस गोद का मिलना सुखद अनुभूति कराता है

नानी की कहानियों का अक्सर ख्याल आता है

नाना संग खेत की पगडंडी पर चलना बुलाता है।


मामा, मौसी संग हँसी ठिठोली, मोरों की मीठी बोली

आँगन मे लगे नीम के पेड़ की निंबोली 

गाँव के मित्रों संग खेलना, आँख मिचौली यह सब

ग्रीष्मकालीन अवकाश आते ही मुझे बुलाता है

माँ को भी मेरे बहाने ही सही,


कुछ दिन का अवकाश मिल जाता है

माँ का माँ के आँचल से लिपट कर फिर से

बच्चा बन जाना मुझको बहुत लुभाता है

ग्रीष्मकालीन अवकाश आते ही ननिहाल

मेरी स्मृति पटल पर यादों का चित्र 

सजीव कर जाता है।


माँ की माँ को माँ कहकर ही 

ये अंजान बुलाता है।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Drama