मुझसे सारे छूट रहे हैं
मुझसे सारे छूट रहे हैं
मुझसे सारे छूट रहे हैं
मन के द्वार टूट रहे हैं
कुछ देर ठहर जाते
ख़्वाब पूरे कर जाते
बगावत के दौर चल रहे हैं
सजावट पे ज़ोर दे रहे हैं
अंतर्मन को कोई नहीं पूछता
दुःख के आँसू कौन यहाँ पूछता
उम्मीद की डोर छूट रही है
मुझसे सवाल कर रही है
कुशल मंगल सब कुछ है
फ़िर भी एक असमंजस है
अरमानों की राख़ पड़ी है
कोशिशें खाक हो चुकी है
जूझ रहा है वक़्त
इतवार हो गए सख्त
सड़क पे मशीनें चल रही है
रिश्तों का बाज़ार लगा है
चेतन शव की बहार लगी है
किश्तों में इंसानियत बिक रही है
जज़्बातों का अकाल पड़ा है
देख इंसान तूँ कहाँ खड़ा है
आसमाँ के सितारें छिप गए हैं
आदमी से किनारे कर लिए हैं
वनस्पति हो गई है अचंभित
कंक्रीट से हो गई है भयभीत
आकाश से ऊँची छलांग लगाई
खुद के ज़मीर में झाँक न पाई
कुदरत की दौलत को शोहरत मान लिया
देख ज़रा ओ इंसान तूने क्या कर दिया।।
