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नोट : कन्टेन्ट क्रमांक चुने हुए जोनर के तहत फिल्टर में प्रदर्शित होंगे : tragedy

रोज प्यार से तुम अपने, आँचल में मुझे छुपाती read more

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अपने नन्हें बच्चों की लाशें सड़ते देखता हूँ, अश्वतथामा की याद में द्रोण सा चिल्ला read more

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नन्हे कोमल हाथों से बर्तन चमकाता है वो कारखानों में भारी बोझ उठाता है वो बड़े read more

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आज ये एक दुःख़द कल्पना है बच्चों ,तुमसब बच्चे यदि न चेते तो ये कजल की भयवाह सच्चाई read more

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वो दर्द की रात थी... तेज बरसात read more

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इन्द्र देव इस बार कुछ, ज्यादा ही नाराज़ लग रहे हैं, मुसीबत शायद देवलोक में है, जमीन read more

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ये माना कि हर तरफ पीने के पानी की कमी है लेकिन जीव पर अत्याचार, बारिश की बेरहमी read more

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घर बनाये झोले ले जाते थे जहाँ वो चारदीवारी ढूंढ रहा read more

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गूंगे बहरे शासन पर या खूनी सिंहासन पर उस बच्ची के जले शरीर पर या अपने देश read more

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तू मेरी पुकार तक ना सुन पाई मां तू मेरी पुकार तक ना सुन पाई read more

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सड़क पे निजी और धार्मिक कार्यक्रम आज़ादी है आज भीड़ द्वारा संदिग्ध की मार पीट आज़ादी read more

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हम बिस्तर होने को मजबूर कराया था ! मैं हर रात वही खड़ी होजाती हूँ ! भूखे बच्चों के read more

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अगर प्यार इसे कहते हैं तो, “इमोशनल अत्याचार “की परिभाषा क्या read more

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न जाने क्यों मिलने पर हमारे ऐतराज़ था बहुत ज़माने को शामिल हो गए सारे एक तरफ और read more

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तिल वाला अंगूठा से मोबाइल में आर्टिकल लिख रही थी आजकल स्त्रियाँ सेफ नहीं read more

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मरहम को इंकार करता वो देश और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की ओर चली read more

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सुन नहीं सकूँगी मैं टन - टन ज़िंदगी की ! मैं कौन read more

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जब तख्त की ज़ुबाँ बोलनेे लगे अखबार, तो कैसे लिख दूँ कि कलम की ताकत अभी ज़िंदा read more

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करवट बदलने पर भी जो सहम जाते थे चीखें मार -मार कर जो आवाज़ लगाते थे एक पल भी जो read more

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चुपचाप खामोश और वह फिर तत्पर हो जाती है एक और चुभन सहने के read more

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यह नज़ारा देख रही औरत की नन्ही बच्ची सबक ले रही है और मन ही मन तय कर रही है कभी read more

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माँ की हिदायत, उल्हाना मत दिलवाना ! भाई ने कहा, बुज़ुर्गों की नाक मत कटवाना read more

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बेटी लक्ष्मी होती है लिखा था एक दीवार read more

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हर घटना का कारण है, जीवन में जो भी हो रहा है, उसको उसका काम करने दो, वो आपको देख रहा read more

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जीवन का चक्रव्यूह तोड़ना सिखाया करते थे। हालात क्या थोड़े से बिगड़ गए, तुम फाँसी read more

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इस भरी जवानी में ही, मुझे ओल्ड कर read more

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कहने को दो-दो घर मेरे, फिर भी मैं पराई हूँ read more

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छोड़ दिया था उस, बच्ची का हाथ आपने, जब वो थी अपनी माँ के कोख़ read more

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यह कविता समाज में किसान के साथ होते अन्याय को आवाझ देती है read more

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दोनों के दिल, रक्षासूत्र और ताबीज़ सब राज़ी थे, पर उन्हें देने वाले द्वेष और द्रोह read more

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