We welcome you to write a short hostel story and win prizes of up to Rs 41,000. Click here!
We welcome you to write a short hostel story and win prizes of up to Rs 41,000. Click here!

Lalita sharma नयास्था

Abstract Drama


5.0  

Lalita sharma नयास्था

Abstract Drama


मैं शब्दों का सौदागर

मैं शब्दों का सौदागर

1 min 546 1 min 546

मैं शब्दों का हूँ सौदागर, भावों को तौल रहा हूँ।

आज लहू से मन की गाँठें, धीरे-से खोल रहा हूँ।।


छंद-अलंकारों की भाषा, न करूँ मंचों की आशा।

तन की बातें समझूँ मन से, अंतर्मन की परिभाषा।

मीठी यादें अपने भीतर, होले-से घोल रहा हूँ।

आज लहू से मन की गाँठें, धीरे-से खोल रहा हूँ।।


जीवन-पथ पर चलता साथी,संग दिया ओ बाती।

वाणी मधुमय रस बरसाती, कंठ सदा ही मितभाषी ।

खट्टे-मीठे अनुभव के ही, फिर समय टटोल रहा हूँ।

आज लहू से मन की गाँठें, धीरे-से खोल रहा हूँ।।


जैसी हो शब्दों की टोली, वैसी बनती हमजोली।

संगी-साथी तब तक अपने, जब तक बात पते की बोली। 

मैं शब्दों के भावों से ही, वर्णों को मौल रहा हूँ।

आज लहू से मन की गाँठें, धीरे-से खोल रहा हूँ।।


Rate this content
Log in

More hindi poem from Lalita sharma नयास्था

Similar hindi poem from Abstract