STORYMIRROR

Yogeshwar Dayal Mathur

Abstract

4  

Yogeshwar Dayal Mathur

Abstract

ज़ख्म

ज़ख्म

1 min
228

ज़िंदगी के खेलों में 

चोटें हमने भी खाई हैं 

कुछ चोटें जिस्मानी थीं

कुछ चोटें जज्बाती थीं

 

जो ज़ख्म बदन पर लगते थे

वह जल्दी ही भर जाते थे

जो ज़ख्म जिगर पर पड़ते थे

अब तक नहीं भर पाए हैं

 

जो ज़ख्म जिस्मानी होते हैं

उनका इलाज हो जाता है

जो ज़ख्म रूहानी होते हैं

वह लाइलाज रह जाते हैं

 

जो ज़ख्म जिस्मानी होते हैं  

निशान उनके रह जाते है

जो ज़ख्म रूहानी होते हैं

वह बे-निशान कहलाते हैं


जो ज़ख्म जिस्मानी होते हैं  

उन्हें नहीं छुपाया जा सकता 

जो ज़ख्म रूहानी होते हैं

अक्सर छुपाये जाते हैं 


जिस्मानी ज़ख्म कुछ लम्हे रुलाते हैं

रूहानी ज़ख्म ताउम्र कसक दे जाते हैं!


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract