STORYMIRROR

Maitreyee Kamila

Abstract

4  

Maitreyee Kamila

Abstract

प्रतिध्वनि

प्रतिध्वनि

1 min
235


चुराया मैंने समुन्दर से मुठ्ठीभर अपनापन

आकाश से कुछ उदारता लिये मेरे कुटीर को उश्वास दिया,

रुक रुक कर चौड़ाई माप रही थी पेर तले जमीन

रात पूरा होने तक

ऐसे भी

सोया था रस्ता धुआं धुंआ   कोहरे की चपेट में

इन्तेजार में थे राशि नक्षत्र

महक उठा समय 

प्रतिध्वनि हो रहा था

पूर्व आकाश से अंधेरा लौट ने का अवसर!



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract