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Pathik Tank

Inspirational


4.3  

Pathik Tank

Inspirational


निंदा

निंदा

1 min 214 1 min 214

बर्फ की वादी में रक्त की नदी बही थी

कुछ अपनों की याद में सबकी आँखों में नमी थी


इश्क़ के जन्नत में खून की होली खेली थी

सत्य की सादगी पे असत्य ने कालिख पोती थी


अमन के रखवालों पे मौत की महफ़िल सजी थी

कुछ कायरों ने शेरों के काफ़िले पे साज़िश रची थी


गरीबी महँगाई धर्म ने अकड़ जब दिखाई थी

इस ख़ाखी वर्दी ने तब राह हमें दिखाई थी


गाँव की गलियाँ पीड़ा सह न पाई थी

जब तिरंगे में लिपटे सूरमा की आत्मा आई थी


कुछ परिवारों के लिए संकट की घड़ी थी

ख़ुदा के दरबार में दहशतगर्दों के लिए छड़ी थी


मातृभूमि की रक्षा में कठिनाई बहुत बड़ी थी

आतंक के कोहराम के बाद निंदा बेहद कड़ी थी


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