जीवन का मंत्र
जीवन का मंत्र
सब स्याह काला था, असल में काले से भी ज़्यादा काला ,
महाकाला, अगर ऐसा कुछ है तो।
एक कालापन जो हमेशा से दूर दूर तक फैला हुआ था,
जो एक इंसान के हृदय के तरह ही धड़कता, सांस लेता था।
प्रतीत होता था मानो
अभी लपककर आएगा और
मुझे ज़िंदा निगल जायेगा
ग्रीष्म ऋतु की इस अंगार उगलती
गरम रात की तपती रेत में ,
अब लगता है ऐसा जैसे
तारों -सितारों ने भी मेरा साथ छोड़ दिया है।
दूर-दूर तक फैले इस अंधियारे में
खुद का अस्तित्व ढूंढने को झाँका,
इधर उधर देखा
तो तम के पिशाच ने मुझे पलटकर
घूरकर देखा।
इस एक क्षण अगर मैंने
इस डर को अपने अंदर जीतने दिया
अगर मन का एक कोना इसे दे दिया तो
हमेशा के लिए
पूरी ज़िन्दगी भर के लिए
इस अँधेरे के अधीन होकर जीना पड़ेगा,
तब उस बदलते पल ,बदलते मेरे समय के सारथी
मेरे अंदर से आवाज़ आई
'डरना नहीं ,कभी पीछे हटना नहीं
अड़ना डटना थमना चलना कुछ भी करना बस ना डरना
डरना नहीं ,कभी पीछे हटना नहीं कालिंदी
कालिंदी तुम भगवान सूर्य की पुत्री, पावन नदी- यमुना हो
उनकी ज्योति , तुम स्वयं उम्मीद की किरण-कृष्णा हो, और
यमुना खामोश नहीं बल्कि नई-सुबह सी चहकती ,
फूलों के रस में खिली बाल मन सा खिलखिलाती ,
कल -कल की आवाज़ से चहल -पहल महकाती ,
तितली सी बहती ही अच्छी लगती है
इन अँधेरी गलियों में अपनी उम्मीद की ज्वाला से प्रज्वलित
उज्ज्वल मशाल से रोशन करती
तुम खुद इस काली रात की इंद्रधनुषी सुबह हो '
मेरे एकांत की ताकत ने मेरे डरे-सहमे ,
एक कोने में दुबके
मेरे अकेलेपन के कान में
किसी मंत्र की तरह फुसफुसाया
