ज्योति किरण
Horror Tragedy Thriller
भगवान् भी ये देख कर के कितना डर गया।
बनाया तो इंसान था, मगर क्या बन गया !
छोटी-छोटी बच्चियों को नोचते हैं जो
वो आदमी नही है, जानवर है बन गया।।
आँख में भी लाज-शरम बाकी ना रही
इंसानियत की आँख का पानी जो मर गया।।
तेरा आना
धड़कनों की धु...
चिरपरिचित याद...
लम्हें जिंदगी...
मेरी दुनिया
अग्निफेरा
पिता
हमनवां
दर्द से रिश़्...
दीदार
लेकिन खूनी मोड़, बली लेने से, बाज न आया। लेकिन खूनी मोड़, बली लेने से, बाज न आया।
चौंक पड़ती है हर वक्त ये नज़र ही, ज़रा सी भी आहट कानों में आए जो। चौंक पड़ती है हर वक्त ये नज़र ही, ज़रा सी भी आहट कानों में आए जो।
काल हो महाकाल हो तुम्हारा अंत के साथ गठजोड़ है। काल हो महाकाल हो तुम्हारा अंत के साथ गठजोड़ है।
कि अचानक टूट जाती है नींद लेकिन नहीं होते ओझल वो खौफ़नाक मंज़र... कि अचानक टूट जाती है नींद लेकिन नहीं होते ओझल वो खौफ़नाक मंज़र...
जीना सीख गई हूँ मैं यूँ रोज़ रोज़ अब मैंने मरना छोड़ दिया।। जीना सीख गई हूँ मैं यूँ रोज़ रोज़ अब मैंने मरना छोड़ दिया।।
तन्हाई में डरावना दृश्य डरावनी रातें डसती है देखो। तन्हाई में डरावना दृश्य डरावनी रातें डसती है देखो।
विश्व में यह क्रांति हो, नारी सुरक्षा और शांति हो ! विश्व में यह क्रांति हो, नारी सुरक्षा और शांति हो !
जिंदगी वैसे तो , किसी न किसी तरीक़े से, हर रोज डराती है। जिंदगी वैसे तो , किसी न किसी तरीक़े से, हर रोज डराती है।
अपूर्व सा वशीकरण होता है... मृत्यु का एक अलग आकर्षण होता है ! अपूर्व सा वशीकरण होता है... मृत्यु का एक अलग आकर्षण होता है !
नींद खुली तो हाँफ रहा था मैं, नींद में भयानक सपना देखा। नींद खुली तो हाँफ रहा था मैं, नींद में भयानक सपना देखा।
दिल में आती है मुस्करातीं है... ये बेटियां बहुत सताती है. दिल में आती है मुस्करातीं है... ये बेटियां बहुत सताती है.
सबकी पिटाई कर थाने ले जाया गया इस तरह भूतिया हवेली का रहस्य समाप्त हुआ। सबकी पिटाई कर थाने ले जाया गया इस तरह भूतिया हवेली का रहस्य समाप्त हुआ।
कविता लिखी तो लगा दिल में बचा है कोई पढ़ेगा तो शायद उतरे ये बुखार। कविता लिखी तो लगा दिल में बचा है कोई पढ़ेगा तो शायद उतरे ये बुखार।
कहानी जहाँ इंसानियत शर्म सार होती हमेशा के लिए जहाँ। कहानी जहाँ इंसानियत शर्म सार होती हमेशा के लिए जहाँ।
खड़े थे पतिदेव सामने, फिर क्या था…… भागी सिर पर रख पैर डरावनी रात। खड़े थे पतिदेव सामने, फिर क्या था…… भागी सिर पर रख पैर डरावनी रात।
राम लीला की आखिरी रात थी, ठंड का महीना था,गर्म कपड़े बदन पर। राम लीला की आखिरी रात थी, ठंड का महीना था,गर्म कपड़े बदन पर।
एक डर और अजीव रोमांच में, मैं भी अपने घर आ सो गया। एक डर और अजीव रोमांच में, मैं भी अपने घर आ सो गया।
की जब है हनुमान जी का आशीष, तब फिर काहें का हॉरर। की जब है हनुमान जी का आशीष, तब फिर काहें का हॉरर।
सिर्फ मैं और मेरा मोती, हम दोनो हर रोज इसी राह से गुजरते हैं। सिर्फ मैं और मेरा मोती, हम दोनो हर रोज इसी राह से गुजरते हैं।
ऐसा जब होता है तो यह काफी डरावना होता है। ऐसा जब होता है तो यह काफी डरावना होता है।