ईश प्रार्थना
ईश प्रार्थना
जीवन-पथ पर विचलित होकर
रूक जाएँ यदि चेतना खोकर
घोर-तम-अज्ञान जहाँ हो,
नहीं राह का ध्यान जहाँ हो
अविरल ज्ञान वृष्टि तुम करना
हे ईश्वर ! दृष्टि तुम रखना।
मानवता हो धर्म जहाँ पर
और पूजा हो कर्म जहाँ पर
जहाँ पाप का चलन नहीं हो,
सच्चाई का दमन नहीं हो
सुन्दर वह सृष्टि तुम रचना
हे ईश्वर ! दृष्टि तुम रखना।
लोभ-मोह पथभ्रष्ट करें न
बुद्धि हमारी नष्ट करें न
विषय-वासना न मन को खींचे,
चलें यदि हम इनके पीछे
मन में अपार तुष्टि तुम भरना
हे ईश्वर ! दृष्टि तुम रखना।
स्वार्थ, कपट और द्वेष क्रोध से
हृदय को तुम निर्मल कर दो
प्रेम, दया, भक्ति, श्रद्धा के,
मन में भाव कोमल भर दो
सद्भावों की पुष्टि तुम करना
हे ईश्वर ! दृष्टि तुम रखना।
सहनशीलता हम में आए
संकट में न मन घबराए
कठिनाइयों में साहस जागे,
कायर बन हम कभी न भागें
मन में अगाध शक्ति तुम भरना
हे ईश्वर ! दृष्टि तुम रखना।
