STORYMIRROR

Kishan Negi

Tragedy Inspirational

4  

Kishan Negi

Tragedy Inspirational

हां, मैं स्त्री हूँ

हां, मैं स्त्री हूँ

1 min
364

हे गुस्ताख पुरुष, ठीक सुना है तूने

सिर्फ स्त्रीत्व ही नहीं है मेरी पहचान

इसके अलावा कुछ और भी है नारी

प्रेम का सागर, ममता का आसमान


सच है, मुझसे ही ज़िंदा है तेरा अस्तित्व

मुझसे ही खिलती तेरे लबों पर मुस्कान

अच्छा ये तो बता देखकर मेरे जिस्म को

पल पल क्यों मचले तेरे हवस भरे अरमान


तेरे बालपन की पटकथा मैंने ही लिखी

करुणामई आंचल की शीतल छांव में

आंधी तूफान से लड़ी हूँ सिर्फ़ तेरे लिए

जब अनगिनत छाले पड़े थे मेरे पांव में


अपने पुरुषत्व पर क्यों है गुमान इतना

क्यों खोखले अहंकार में तू झूल रहा है 

मेरे होने भर से सार्थक हुआ तेरा होना

ममता की करुणा को क्यों तू भूल रहा है


मेरी खामोशी के पीछे जो दर्द छिपे हैं 

तू कभी जान ना पाया क्या कहती हैं 

तेरी वासना के वाणों से जिस्म घायल है

आंखों से वेदना बूंद-बूंद कर बहती है 


अपमान के असंख्य घूंट पीकर भी खुश हूँ 

बाद इसके भी नहीं तुझसे कोई शिकायत

तुझे भ्रम है कि तुझसे ज़िंदा है मेरा वजूद

सच तो ये हैं कभी चाही नहीं तेरी इनायत



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy