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Kusum Joshi

Tragedy

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Kusum Joshi

Tragedy

छोड़ ज़माने को तुझमें ही समाता हूँ

छोड़ ज़माने को तुझमें ही समाता हूँ

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मैं तो खुश ही हूँ मगर आँख क्यों ये रोती है,

भीगी पलकों में कहीं आस डूबी खोती है,

रोज़ अश्क़ों में गुज़र जाता है मुस्कान का सफ़र,

हम तो जगते हैं नींद चुप सी रात सोती है,


क्या हुआ कि यूं परिंदों ने चहकना छोड़ा,

आशियाँ अपना अपने हाथ से किसने तोड़ा,

हम रहे ढूंढते आशाओं के संदूक कहीं,

मिले संदूक खाली आस ने दामन छोड़ा,


राहें लम्बी कि इतनी इनमें बिखर जाता हूँ,

तन्हा इतना हूँ की खुद से भी ना मिल पाता हूँ,

बीच मझधार में छोड़ा मुझे था माझी ने,

डूबती नाव है पतवार ख़ुद चलाता हूँ,


गिला कुछ भी नहीं है मुझको इस ज़माने से,

डर तो तू भी गया कि साथ कुछ निभाने से,

मैंने पाया है बुरे वक्त में तन्हा ख़ुद को,

सच्चे वादे कि सभी लगते अब फ़साने से,


रहम बस कि उस ख़ुदा का है साया मुझ पर,

कि दौरे ग़म में आस बनकर समाया मुझ पर,

कि ठोकरें खाकर ज़िन्दगी में सम्भलना सीखा,

बरसा अमृत सा ख़ुदा बनकर ख़ुदाया मुझ पर,


कि छूटे साथ अब ज़माने का कि ग़म भी नहीं,

खुशियाँ ज्यादा नहीं हैं लेकिन ये कि कम भी नहीं,

मिला जब से ये साथ पाक सा तेरा मुझको,

तू ही तू है कि मुझमें तबसे कोई मैं भी नहीं,


तेरे छूते ही देख कैसे संवर जाता हूँ,

तेरी राहों में खुशबू बन के बिखर जाता हूँ,

तूने थामा था मुझको छोड़ा जब ज़माने ने,

अब छोड़ ज़माने को तुझमें ही समाता हूँ।।


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