STORYMIRROR

औरत

औरत

1 min
27.9K


औरत के जैसा,

गुण किसी में नहीं,

मिला इन्हें कुदरत का,

करिश्मा है।


अवगुण मुझ में,

ज्ञान भरा इसी ने,

जिसे मैं, माँ कहके,

पुकारता हूँ।


क्या गजब की,

त्याग, छमा, याचना,

ममता, प्यार, दुलार,

इनमें कूट-कूट कर,

समाहित होती है।


इतना बड़ा त्याग,

अपना घर छोड़ना,

एक पराये, पुरुष को,

सब कुछ समझना,

फिर एक मासूम से,

फूल को जन्म देती है।


जो आगे चलकर,

एक बृच्छ का,

सहारा ले लेता है,

सृजन एक पौधे के जैसा।


औरत करती है,

मगर हमारा अँधा समाज,

इन्हें अपना,

गुलाम समझता है।


ना जाने कब,

ये अंधविश्वास,

की दीवारे ढहेंगी,

और औरत को,

उसके हिस्से की,

खुशी मिलेगी।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Drama