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अंतर्द्वंद्व

अंतर्द्वंद्व

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यह हवा जो छूते हुए आई है

तुम्हारे अक्स का और

प्रवेश चाहती है।

मेरे हृदय गवाक्ष में

आह्लादित कर रही है मुझे

मन में फिर आज

हजारों ख्वाहिशें ले रही हैं जन्म

और आतुर हैं पाने को पूर्णता

मानसिक संवेदनाओं पर

कहाँ चलता है कोई यांत्रिक उपाय!

यूँ ही कुछ बातों में

कल, आज और कल की

फिर से उलझ कर रह गया है मन

क्यूँ, कहाँ, कैसे... जैसे

न जाने कितने ही प्रश्नों

से अंर्तद्वंद में लगा है

चेतन और अचेतन मन!

क्यूँ न चाहते हुए भी

खिचीं जा रही हूं मैं?

ये क्या हो रहा है

नेपथ्य में?

यथार्थ है या कोई दिवास्वप्न!

भयभीत सा हृदय मेरा

नहीं सुनना चाहता कुछ ऐसा

जो बिखेर दे बाग- ए - गुलिस्तां मेरा

क्योंकि खंडित स्वप्न क्षीण कर देते हैं,

अक्सर यथार्थ के स्वरूप को...!


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