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Alka Ranjan

Tragedy

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Alka Ranjan

Tragedy

अनकही सी व्यथा कोई

अनकही सी व्यथा कोई

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खबर जब लॉकडाउन की एक दम से आई

स्कूल-कॉलेज, दफ्तर, मिल-फैक्ट्रीयाँ, बाजार- हाट बंद कराई

सड़कें, बस-ट्रेन, आवाजाही पे भी रोक लगाई

निकले थे जो शहर खुशियाँ कमाने, 

सपनों पे उनके तब पानी फिर आई।

थे वो पल बड़े कष्टदायी 

मासूमों ने जाने किस बात की थी सजा है पाई

रोते बिलखते पलायन करते गरीब,

कोई मरे भूख से तो कहीं कारण बीमारी

 दिन बीते तब भूखे प्यासे कई

उम्मीद न देख रोजी रोटी की कोई

फिक्र घर और अपनो की सताई 

चल पड़ा तब वह भूखा ही

शहर से अपने गांव की ओर 

वजह वैश्विक महामारी और बेरोजगारी 

पैदल ही निकली उसकी सवारी 

पास थी उसके कुछ रोटियां सुखी सारी

पर रोटियों को देख अपने नन्हे मुन्नों की सिसकियां कानों में आई 

बाँध ली फिर अपनी पोटली 

पीकर बस पानी तब भूख मिटाई 

रास्ता था कठिन, गर्मी भी तपतपायी 

चलता रहा ऊंचे नीचे डगर में बस घर वापसी की सुध लगाई 

जब घर था बहुत पास, एक रात रेलवे ट्रैक में ही बिस्तर बिछाई 

कल अपनों से है मिलने की बारी सोच उसकी नींद गहराई

 बड़ी भयावह है इससे आगे कहानी 

उसी ट्रैक से गुजरी उस रात एक रेलगाड़ी 

चिथड़े उड़ गए उनके तन की

 बिखरी रोटियां सारी 

सांसे छूटी आशाएं भी टूटी 

रह गई अधूरी फिर एक गरीब की कहानी 

हृदयविदारक था मंजर, आँखें सबकी भर आई

सड़क पे जीना और सड़क पे ही मर जाना

क्यों ऐसी किस्मत है गरीब ने पाई

बस रोटी तक ही सिमट जाती उनकी जिंदगानी ।

ईश्वर भी ना डाले दृष्टि इन पर अपनी कोई

हो महंगाई या आपदा कोई सब उस पे ही है भारी

कहलाए वो देश की नींव 

पर असलियत में रहता सिर्फ आंकड़ों, खबरों 

तो कभी कविताओं में बटोरे सहानुभूति यूं ही।।



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