STORYMIRROR

निशान्त "स्नेहाकांक्षी"

Fantasy

4  

निशान्त "स्नेहाकांक्षी"

Fantasy

अजनबी अक्स मेरा

अजनबी अक्स मेरा

1 min
340

निकला था किसी ऐसे शख़्स की तलाश में, 

हो पाप का भागी ,ऐसे किसी दुराचारी को ढूँढने की आस में, 

जगा सकूँ इंसानियत उस शख़्स के ज़मीर में, 

देखता जा रहा था बुराई हर एक राहगीर में! 


है बुराई क्षण में भंगुर, अच्छाई दबा ना पाएगी, 

हर बुरे इंसां से लड़कर, इंसानियत सामने आ जायेगी, 

यही सोच मन में बसा कर, एक बुरे की तलाश में, 

चल रहा था द्वंद् पथ पर, ढूँढने बुराई किसी खास में! 


इक शख़्स खड़ा था दूर मुझसे, धुंधली परत की ओस में, 

था अजनबी सा, परिचित भी था, माथे पर कुछ खरोंच से, 

इस शख़्स की बुराई से था मैं वाक़िफ़ हर इक रग से था, 

कद काठी और हाव भाव, चलने के उसके ढंग से था! 


चेहरे पर उसके रोशनी थी, अजनबी वो हँस रहा, 

ढूँढ बुराई खुद में पहले, तंज वो था कस रहा, 

बुरा ढूँढने मैं चला था, लिए नज़र खोट की, 

अजनबी वो अक्स था मेरा, हृदय पर जिसने चोट की ! 


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Fantasy