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Shailly Shukla

Drama Fantasy


0.6  

Shailly Shukla

Drama Fantasy


प्रियतम

प्रियतम

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कुछ पंक्ति जब प्यार भरी

लिखनी प्रियतम के नाम हैं

कौन भला यह जान पायेगा

कितना कठिन यह काम है ।


वह जो कुछ भी नहीं थे मेरे

प्राण बने अब रहते हैं

जैसे बेल को दिए सहारा

वृक्ष तने सब रहते हैं ।


उनसे ही अस्तित्व

उन्ही से हंसी खिली है होठों पर

भूल गयीं अँखियाँ सब आंसू

गीत सजे हैं होठों पर ।


क्या बतलायें उनको उनसे

रिश्ता कैसा अपना है

साक्षात मूरत में ढल गया

बरसों का वो सपना है ।


कैसे लिखेगा कलम

भावनाएं जो मन न समझ पाए

जितना पिया से दूर रहे

उतना ही उन में उलझ जाये ।


वात्सल्य उनकी आँखों का

वर्णन से है दूर बहुत

स्नेहिल वोह मुस्कान कसम से

करती है मजबूर बहुत ।


जान पड़े आकांक्षाओं में

जब दीख जाये उनकी सूरत

राधा के लिए कृष्ण थे जो

मेरे मन उनकी वो मूरत ।


वो जैसे ईश्वर ने भेजा -

जा तू जहाँ वोह धरती है !

बिछा के पलकें जोगन इक

इंतज़ार तेरा बहुत करती है ।


इस कारण बिन जान-समझ

मेरे जीवन में आये चले

भर दी खुशियों से झोली

किया गगन पैरों के तले ।


सच कर दिए स्वप्न सभी

उन्होंने पास हमारे आते ही

कि लगे स्वप्न सा यह जीवन

मन कांपे खुद को जगाते भी ।


आये हो तो प्रियतम मुझको

छोड़ कहीं न जाना तुम

जिस नगरी से खींच लाये हो

वहीँ न फिर पहुँचाना तुम ।


तुम बिन आँखों के मोती

बरसेंगे इस झोली में

मेरी खुशियों के रंग सभी

फिर बिखर जायेंगे होली में ।


तुम बिन राधा फिर से देखना

रूप धरेगी मीरा का

कौन जान पायेगा मर्म

उसके हृदय की पीड़ा का ।


ऐसा न हो जाने से तुम्हारे

जग तो सारा संभल जाए

पर 'शैली' के तन से

धीरे से यह प्राण निकल जाएं ।


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