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Deepak Kaushik

Horror Crime Thriller


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Deepak Kaushik

Horror Crime Thriller


प्रतिघात

प्रतिघात

20 mins 320 20 mins 320

शहर में इन दिनों आतंक फैला हुआ है। रात दस बजे के बाद लोग अपने घरों से बाहर नहीं निकलते। कारण- शहर में एक नर कंकाल घूमता हुआ दिखाई पड़ता है। ये कंकाल कभी पीछे से आकर लोगों के कंधे पर हाथ रख देता है, तो कभी दोनों हाथों से कमर को पकड़ कर हवा में उड़ जाता है, कभी अचानक से प्रकट होकर लोगों को चौंकाता है, तो कभी अचानक से अदृश्य भी हो जाता है, कभी अपनी डरावनी हंसी से लोगों को डराता है, तो कभी अपनी आंखों से अंगारे बरसा कर डराता है, कभी सड़क के बीचों-बीच नाचते हुए चलने लगता है जिसके कारण राह चलते लोग स्तंभित से हो जाते हैं। कंकाल की इन हरकतों से कुछ लोग बेहोश हो जाते हैं, तो कुछ लोगों की ह्रदयाघात से मृत्यु भी हो गई है। सामान्यतः ये लोगों को सिर्फ डराता है। परंतु कुछ लोगों पर इसने प्रहार भी किये हैं। जिन पर इसने प्रहार किया वो या तो काल के गाल में समा गए या फिर पागल हो गए।

पुलिस भी रात में गश्त करने से डरती है। जिन पुलिसकर्मियों की रात में ड्यूटी लगती है उनकी रातें हनुमान चालीसा पढ़ते ही गुजरती है। न जाने कब, कहां से कंकाल प्रकट होकर उनके हृदय की धड़कनों को विराम लगा दे। सामान्यत: पुलिस वाले भी रात के समय अकेले नहीं रहते।

शहर की हालत को देखते हुए पुलिस कमिश्नर ने एक एस. टी.एफ. का गठन किया। तेज-तर्रार और दबंग ए.सी.पी. अनुभव सिंह को एस.टी.एफ. का मुखिया नियुक्त किया। अनुभव ने अपनी टीम और टीम के मुखबिरों का पूरे शहर में जाल सा बिछा दिया। मगर कंकाल की कोई सटीक जानकारी नहीं मिल पाई। अंततः एक.सी.पी. अनुभव सिंह ने स्वयं गश्त लगाने का निर्णय लिया। उन्होंने अपनी टीम को छः हिस्सों में बांटा प्रत्येक टीम में पांच-पांच सदस्यों की व्यवस्था की। प्रत्येक सदस्य को आधुनिक हथियारों से लैस किया।

एक बड़ा सा हाल, हाल में चारों तरफ भरा कबाड़, धूल-मिट्टी और गंदगी का अंबार। हाल की दीवारों से लगी पंक्तिबद्ध अलमारियां, जिनमें विभिन्न प्रकार की शीशियों और जारों में न जाने क्या-क्या भरा हुआ था। कुछ अलमारियों में विज्ञान की विभिन्न शाखाओं की पुस्तकें भरी पड़ी थीं। हाल के बीचों-बीच एक लंबी-चौड़ी मेज, मेज पर हड्डियों जैसी संरचनाएं बेतरतीबी से पड़ी थीं। मध्य की मेज और अलमारियों के बीच चारों दिशाओं में रास्ता छोड़ते हुए लंबी-लंबी मेजें थीं। उन मेजों पर विभिन्न प्रकार के उपकरण रखें हुए थे। उन उपकरणों में कहीं कोई द्रव उबल रहा था तो कहीं कोई चूर्ण किया गया ठोस पदार्थ रखा था। हाल में एक अजीब सी गंध फैली हुई थी। एक तरफ की मेज पर एक कम्प्यूटर रखा था जो इस समय आँन था। उस कम्प्यूटर के सामने एक ३०-३५ वय का युवक किसी सर्किट का बड़े ध्यान से अध्ययन कर रहा था।

यदि आप अभी भी न समझे हों तो बताते चलें कि यह एक प्रयोगशाला है और यह युवक एक युवा वैज्ञानिक। जो किसी प्रकार की खोज या अनुसंधान में लगा हुआ है।

यूं तो रंजन बचपन से ही अत्यंत मेधावी था। परंतु ईश्वर ने उसमें दो ऐसी कमियां डाल दी थीं जिन्होंने रंजन की मेधा शक्ति पर ग्रहण लगा दिया था। एक; मेधावी होने के बावजूद भी उसकी अंक तालिका कभी बहुत सुंदर नहीं हुई। दरअसल उसका मन कोर्स की किताबों में कम और कोर्स से बाहर की किताबों में अधिक लगता था। विज्ञान का विद्यार्थी था- इसलिए विज्ञान की विभिन्न शाखाओं की पुस्तकों का अध्ययन करता रहता था। उसे नये-नये प्रयोग करने का भी शौक था। इंटर से लेकर एम.एससी. तक उसने न जाने कितने और कौन-कौन से प्रयोग किये। कभी वो हेलिकॉप्टर बनाकर उड़ाता तो कभी बिना पेट्रोल के आटोमोबाइल चला देता। कभी रसोई में प्रयोग होने वाली वस्तुओं से बिजली पैदा कर देता तो कभी विमान का ले-आउट तैयार कर देता। बी.एससी. की पढ़ाई के दौरान ही उसने प्रमाणित कर दिया था कि इलेक्ट्रान, प्रोटान और न्यूट्रान भी सूक्ष्म कणों से मिलकर बने हैं। वो सूक्ष्म कण और भी सूक्ष्म कणों से मिलकर बने हैं। और ये अति सूक्ष्म कण प्रकृति के अंतिम सूक्ष्म कण हैं। उसके इस सिद्धांत को उसके शिक्षकों ने भी सही माना था। यही वो कारण थे जिनकी वजह से परीक्षा के समय प्रश्नों का सही उत्तर लिखने के बावजूद भी घिसे-पिटे ढ़र्रे पर चलने वाले शिक्षकों और जांचकर्ताओं के सिर के ऊपर से उसकी बात गुजर जाती और उसकी अंकतालिका का सौंदर्य बिगड़ जाता। कम्प्यूटर का तो मास्टर ही था। क्या हार्डवेयर और क्या सॉफ्टवेयर, दोनों जैसे उसके इशारे पर काम करते थे। दो, वह अति कुरूप था। उसकी कुरूपता के कारण उसके सहपाठी भी उससे दूर भागते थे। उसे याद है- जब वो छठी कक्षा में पढ़ता था, उसने अपने साथ पढ़ने वाली छात्रा पायल, जिसकी स्वयं की सूरत किसी बंदरिया जैसी थी, से कहा था-

"मुझसे दोस्ती करोगी?"

जवाब मिला-

" छीऽऽऽ! तुमसे दोस्ती? कितने गंदे हो तुम।"

जब वो इंटर प्रथम वर्ष में था और जब उसकी आंखों ने पहली-पहली बार रंगीन सपने देखने शुरू किये थे। उसे अपनी सहपाठी अनुप्रिया से पहला-पहला प्यार हो गया। बहुत डरते-डरते उसने अनुप्रिया से अपने मन की बात कही-

"अनुप्रिया! मुझे तुमसे प्यार हो गया है।"

अनुप्रिया का जवाब था-

"मैं तुम्हारी भावनाओं की कद्र करती हूं। मैं तुम्हें सकारात्मक जवाब दे सकती हूं। मगर तब जबकि तुम यही बात सबके सामने कहो।"

रंजन ने वैसा ही किया जैसा अनुप्रिया ने कहा था। अनुप्रिया का जवाब आया-

"मुझसे ये बात कहने से पहले आईने में अपनी सूरत तो देख ली होती।"

न केवल अनुप्रिया ने उसका उपहास उड़ाया अपितु उसकी सहेलियों और दोस्तों ने भी उसकी खिल्ली उड़ाई। रंजन की आंखों में आंसू आ गए थे।

बात यहां पर भी नहीं रुकी। गिरते-पड़ते किसी तरह एम.एससी. करने के बाद रंजन नौकरी की तलाश में निकला। यहां भी उसकी इन दोनों कमियों ने बाधा उत्पन्न की। जहां भी नौकरी के लिए जाता, इंटरव्यू लेने वाले उसकी अंकतालिका की बदसूरती देखते ही उसे रिजेक्ट कर देते। साक्षात्कारकर्ता उसकी मेधाशक्ति नहीं देख पाते। किसी तरह एक जगह नौकरी मिली भी तो वहां भी वो अधिक दिनों तक टिक नहीं पाया। जहां उसे नौकरी मिली थी, वहां भी पहले तो साक्षात्कारकर्ता ने उसे रिजेक्ट कर ही दिया था। वो वापस जाने के लिए मुड़ा ही था कि उसकी दृष्टि साक्षात्कारकर्ता के सामने रखे किसी प्रोजेक्ट के ले-आउट प्लान पर पड़ी। उसे उत्सुकता हुई। उसने साक्षात्कारकर्ता से पूछा-

"क्या मैं इसे देख सकता हूं?"

साक्षात्कारकर्ता को उसकी उत्सुकता पर प्रतिउत्सुकता उत्पन्न हुई। उसने अनुमति दे दी। रंजन ने ले-आउट को सरसरी दृष्टि से देखा।

"वैसे तो ले-आउट बहुत अच्छा बना है, मगर इसमें थोड़ा सा संशोधन कर दिया जाए तो और भी अच्छा बन जाएगा।"

"और वो संशोधन क्या होना चाहिए?"

साक्षात्कारकर्ता ने प्रश्न किया।

जवाब में रंजन ने पेंसिल उठाई और ले-आउट में संशोधन कर दिया। साक्षात्कारकर्ता को संशोधन समझ में आ गया और उसने तत्काल रंजन को नियुक्ति दे दी। परंतु जैसा कि पहले ही कहा कि यहां भी रंजन अधिक दिनों तक नहीं टिक पाया था। दरअसल रंजन की मेधाशक्ति से खूबसूरत अंकतालिका वालों को खतरा पैदा होने लगा और उन्होंने रंजन के विरुद्ध षडयंत्र करना शुरू कर दिया। अंततः उसे अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा।

नौकरी जाने के साथ ही रंजन को समझ आ गया कि नौकरी नाम की चीज उसके लिए नहीं बनी है। रंजन के सामने समस्या उठ खड़ी हुई कि वो अपना जीवन यापन कैसे करे?

रंजन ने अपने घर में कम्प्यूटर लगा रखा था। नौकरी छूटने के बाद एक दिन रंजन ने एक धन कुबेर का बैंक खाता हैक किया और दस लाख रुपए उड़ा दिए। रंजन कभी पकड़ा न जाए इसके लिए उसने कई सावधानियां भी बरती थीं। ये रंजन के जीवन का पहला अपराध था। बात यदि यहीं समाप्त हो जाती तो भी कोई बात नहीं थी। रंजन किसी धनकुबेर का खाता हैक करता, खाते से कुछ बूंदें निकाल लेता, उसका काम चलता रहता। किसी को कुछ पता भी नहीं चलता। मगर उसकी अप्रतिम मेधाशक्ति और समाज द्वारा मिले दुर्व्यवहार ने उसे इससे भी बहुत आगे सोचने और करने के लिए बाध्य कर दिया। धन की व्यवस्था का माध्यम वो पैदा कर चुका था। उसने अपनी प्रयोगशाला स्थापित कर ली और अपने प्रयोगों में प्रण-प्राण से लग गया।

कम्प्यूटर पर दृष्टि गड़ाए युवा वैज्ञानिक का चेहरा अचानक ही हर्ष से खिल उठा।

"ओह! तो गड़बड़ी यहां पर थी।"

युवा वैज्ञानिक उठकर मध्य वाली मेज पर आया। मेज पर रखी संरचनाओं में से एक को खोलकर उसके अंदर ठूंस-ठूंस कर भरे हुए तारों और अन्य उपकरणों को बड़ी सावधानी से बाहर निकाला। जो गड़बड़ी कम्प्यूटर पर खोज निकाली थी उसे दूर कर दी।

रात के एक बज रहे थे। ए.सी.पी. अनुभव सिंह अपने अन्य साथियों के साथ पुलिस जीप से उतर कर पैदल ही इधर-उधर घूम रहे थे। दरअसल उन्हें और उनके अन्य चारों साथियों को चाय की तलब महसूस हो रही थी। वो किसी चाय की दुकान की तलाश में थे। मगर आतंक के इस माहौल में किस दुकानदार की शामत आई थी कि इतनी रात गए दुकान खोलता। ऐसे में उनके एक साथी, सब इंस्पेक्टर नीरज माथुर ने, जो इस इलाके के चप्पे-चप्पे से परिचित था, अपने नायक की अनुमति से एक फुटपाथिया दुकान को खुलवाकर चाय बनवाने की व्यवस्था की। इस दुकान का मालिक आतंक फैलने से पहले रात भर दुकान खोले रखता था। परंतु अब यह रात नौ बजे दुकान बंद कर दुकान के भीतर ही सो जाता था।

दुकानदार ने चाय बनाने की व्यवस्था की। गैस पर चाय खौलने का इंतजार कर रही थी कि अचानक एक.सी पी. सिंह ने हाथ बढ़ाकर गैस बंद कर दी। इससे पहले कि कोई कुछ पूछता, अनुभव सिंह ने फुसफुसाते हुए कहा-

"सब लोग एलर्ट हो जाओ।"

सभी अपने-अपने हथियार हाथों में लेकर चौकन्ने हो गए। अनुभव सिंह ने दुकानदार से कहा-

"तुम झटपट दुकान अंदर से बंद करके सो जाओ।"

साथ ही अपनी जेब से सौ का नोट निकाल कर दुकान की मेज पर डाल दिया और दुकान से बाहर आ गए। उनके पीछे-पीछे उनके साथी भी दुकान से बाहर आ गए। अनुभव सिंह के पास रिवाल्वर थी और उनके साथियों के पास आटोमेटिक राइफलें। चौराहा घने अन्धकार में डूबा था। सामने कंकाल चौराहे के बीचों-बीच नाच रहा था। उसका नाच देखकर अनुभव सिंह और उनके साथियों के रोंगटे खड़े हो गए।

"इसकी खोपड़ी पर निशाना साधना है। पहले धीरे-धीरे इसकी चारों तरफ से घेराबंदी करनी है। फिर जैसे ही मैं संकेत करूं, इस पर एक साथ गोली बरसानी है। ओके?"

"ओके!"

सभी ने एकसाथ मगर बहुत धीमी आवाज में कहा।

पांचों व्यक्ति एक-दूसरे से थोड़े-थोड़े से अंतराल के साथ कंकाल को घेरते हुए उसकी तरफ बढ़ने लगे। कंकाल के कुछ करीब पहुंच कर अनुभव सिंह ने संकेत किया। पांचों के हथियार एक साथ गरजने लगे। मगर ये क्या? पहली खेप की गोलियां टकराते ही कंकाल गायब हो गया। कंकाल से गोलियों के टकराने पर ऐसी ध्वनि उत्पन्न हुई जैसे गोलियां किसी धातु से टकराई हों। अनुभव सिंह जिस जीप से आए थे वो कुछ दूरी पर खड़ी थी। उसका ड्राइवर अपनी टीम के साथ ही था। कंकाल के गायब होते ही वो जीप की तरफ भागा और कुछ ही मिनटों में जीप को उसी स्थान पर लेकर आ गया। जीप में हाई पावर टार्चें रखी थीं। अगले कुछ ही पलों में चौराहा तेज रोशनी से नहा उठा। कंकाल का तो कुछ पता नहीं चला परंतु जिस स्थान से कंकाल गायब हुआ था उसके समीप से ही धातु का एक सफेद रंग का टुकड़ा प्राप्त हुआ जिसे अनुभव सिंह ने अपने पास रख लिया। अनुभव सिंह ने पुनः दुकान खुलवा कर चाय बनवाई। अपने साथियों के साथ चाय पी और वापस गश्त लगाने चल पड़े।

अगले दिन अनुभव सिंह अपने कार्यालय में स्थित अपने कक्ष में बैठे हुए थे। उनके सामने मेज पर वही धातु का टुकड़ा रखा हुआ था। अनुभव सिंह बड़े ध्यान से उस टुकड़े को देख रहे थे। बीच-बीच में उसे हाथ में लेकर उलट-पलट कर देखने लगते। कुछ देर बाद अनुभव सिंह ने फोन उठाकर कार्यालय के सहयोगी को लगाया।

"दूबे! जरा मेरे चैंबर में आना।"

"आता हूं, सर!"

कुछ ही पलों में दूबे अनुभव सिंह के सामने था।

"यस सर!"

"दूबे! एक कंकाल की व्यवस्था हो सकती है?"

"यस सर! हो जाएगी।"

"कब तक व्यवस्था कर सकते हो?"

"शाम होने से पहले।"

"ओके! गो अहेड!"

दूबे चैंबर से बाहर जाने लगा।

"और सुनो।... पूरा कंकाल न मिले तो कोई बात नहीं। किसी एक हड्डी से भी काम चलेगा।"

"ठीक है, सर।"

दूबे बाहर जाने के लिए पलटा। परंतु दरवाजे से पहले ही पुनः पलटा।

"सर! हड्डी मनुष्य की ही चाहिए या पशुओं की भी चलेगी?"

"मनुष्य की हो तो ज्यादा बेहतर है।"

"ठीक है, सर! मैं व्यवस्था करके सूचना देता हूं।"

और दूबे चैंबर से बाहर निकल गया।

शाम होने से पहले कार्यालय के गोपनीय कक्ष में मेज पर मनुष्य की खोपड़ी रखी हुई थी। पास ही अनुभव सिंह और दूबे खड़े हुए थे। दूबे ने वीडियो और ऑडियो रिकॉर्डिंग की व्यवस्था भी कर ली थी। दोनों व्यवस्थाएं चालू कर दी गई थीं। अनुभव सिंह ने खोपड़ी से कुछ दूर वही धातु का टुकड़ा रखा और उस पर अपनी रिवॉल्वर से गोली चला दी। फिर एक गोली खोपड़ी पर चला दी। खोपड़ी टुकड़े-टुकड़े हो कर बिखर गई। अनुभव सिंह अपने चैंबर में चले गए और दूबे ने दोनों रिकार्डिंग अपने अधिकार में कर लीं।

रात नौ बजे अनुभव सिंह और उनकी पूरी टीम कान्फ्रेंस हाल में एकत्र थी। दूबे ने दोनों रिकार्डिंग सभी सदस्यों के सामने चलाई। उसके बाद अनुभव सिंह ने अपने साथियों को संबोधित किया-

"इन दोनों रिकार्डिंग से स्पष्ट है कि घटना स्थल से मिला टुकड़ा किसी मनुष्य के कंकाल का हिस्सा नहीं है। ये एक धातु का टुकड़ा है। और यदि ये धातु का टुकड़ा है तो जिस कंकाल ने शहर में आतंक फैला रखा है वो कंकाल न होकर कोई रोबोट है। ...और यदि ये रोबोट है तो निश्चित रूप से इसे नियंत्रित करने वाला भी कोई न कोई अवश्य होगा। वही असली अपराधी है। मगर प्रश्न यह है कि उस अपराधी तक कैसे पहुंचा जाये?"

"मगर सर! यदि ये रोबोट है तो यह अचानक से प्रकट कैसे हो जाता है और अचानक से अदृश्य कैसे हो जाता है? और वो, लोगों को पकड़ कर हवा में में कैसे उड़ जाता है?"

"प्रश्न बहुत से हैं, जिनका उत्तर अभी हमारे पास भी नहीं है। अभी हमें उस कंकाल का एक छोटा सा टुकड़ा मिला है जिससे हमें ये पता चला है कि जिसे लोग प्रेत लीला समझ रहे हैं वो वास्तव में किसी भ्रष्ट बुद्धि वैज्ञानिक की खुराफात है। इन सारे प्रश्नों के उत्तर हमें तभी मिल सकेंगे जब या तो हमें पूरा कंकाल मिल जाए या फिर उस कंकाल को अविष्कृत करने वाला वैज्ञानिक। हमें ये सोचना है कि वो वैज्ञानिक कहां छुपा बैठा है इसका पता कैसे चले?"

कान्फ्रेंस हाल में सन्नाटा छा गया। सभी एक ही प्रश्न पर विचार कर रहे थे। उस वैज्ञानिक तक कैसे पहुंचा जाये।

"सर! मैं कुछ सलाह दूं।"

दूबे ने पहली बार कुछ कहा। दरअसल दूबे कार्यालय के काम देखता था। उसका पद भी कोई ज्यादा बड़ा नहीं था। दो साल बाद सेवामुक्त भी होने वाला था। पूरी जिंदगी काम करने के बाद अब बड़े बाबू के पद पर पहुंचा था।

"हां... हां...! बिल्कुल सलाह दो।"

अनुभव सिंह जानते थे कि व्यक्ति या उसका पद बड़ा नहीं होता। कभी-कभी छोटे पद वाले भी सटीक सलाह दे देते हैं।

"सर! यहां बल का नहीं बुद्धि का काम है। वैज्ञानिक का जवाब वैज्ञानिक ही दे सकता है।"

"तुम्हारे कहने का मतलब मैं समझ गया हूं। फिर भी तुम जो कुछ भी कहना चाहते हो खुल कर कह सकते हो।"

"सर! मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि; जब यह स्पष्ट हो चुका है कि शहर में आतंक मचाने वाला कोई वैज्ञानिक है तो उस तक पहुंचने का उपाय भी कोई वैज्ञानिक ही बता पाएगा। आपको अपनी टीम में वैज्ञानिकों को शामिल करना चाहिए।"

"ठीक है। कल मैं अपनी टीम में वैज्ञानिकों की व्यवस्था करता हूं। फिलहाल आज हम लोग रोज की तरह अपनी-अपनी टीम के साथ पेट्रोलिंग पर चलते हैं।"

"सर! आप लोग पेट्रोलिंग पर अवश्य जाइये। मगर जहां तक मैं समझता हूं आज की रात ही नहीं बल्कि हो सकता है कि आने वाली दो-तीन रातें भी शांति से गुजरें।"

दूबे ने फिर कहा।

"ऐसा तुम्हें क्यों लगता है?"

"कल रात आप लोगों ने कंकाल या रोबोट पर फायरिंग की थी जिससे कंकाल या रोबोट का एक टुकड़ा टूट गया जो बाद में आपको मिल गया। अभी तक जो सूचनाएं प्राप्त हुई हैं उनके आधार पर केवल एक ही रोबोट या कंकाल है जो आफत मचा रहा है। तो आज वो अपराधी वैज्ञानिक उसे रिपेयर करेगा। इसलिए कम से कम आज की रात कोई उपद्रव नहीं होगा।"

"तुम्हारा कहना ठीक है। फिर भी हम लोग अपना काम तो करेंगे ही।"

कहकर अनुभव सिंह और उनकी पूरी टीम अपने-अपने क्षेत्र में गश्त करने चली गई। जैसा कि दूबे ने कहा था, वो पूरी रात शांति से गुजर गई। कहीं से किसी भी अनहोनी घटना की सूचना नहीं आई।

अगले ही दिन अनुभव सिंह पुलिस कमिश्नर से मिले। अपने केस के संबंध में पूरी रिपोर्ट उनके सामने रखने के बाद उनसे वैज्ञानिकों की मांग की। जिसे कमिश्नर साहब ने तत्काल स्वीकार कर लिया। उन्होंने उसी समय गृह सचिव से बात करके अपनी मांग के बारे में बात की। गृह सचिव ने घंटे भर के भीतर वैज्ञानिकों की टीम की व्यवस्था कर दी।

अनुभव सिंह के पास वैज्ञानिकों का दल पहुंच गया। इस दल का नेतृत्व प्रोफेसर सुरेंद्र मलिक कर रहे थे। आते ही काम में जुट गए। अनुभव सिंह ने कंकाल से प्राप्त हुआ टुकड़ा मलिक साहब को सौंप दिया।

रात नौ बजे सभी लोग पुनः कांफ्रेंस हाल में एकत्र थे। इस बार कांफ्रेंस हाल में प्रोफेसर सुरेंद्र मलिक और उनके साथी वैज्ञानिकों के अतिरिक्त दूबे भी मौजूद थे। अनुभव सिंह ने दूबे को स्थाई रूप से टीम का हिस्सा बना लिया था। अनुभव सिंह कह रहे थे-

" जैसा कि आप सभी लोग जानते हैं कि पिछली बार कंकाल से मुठभेड़ के दौरान कंकाल का एक हिस्सा हम लोगों को प्राप्त हुआ था। जिससे हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि यह कंकाल नहीं बल्कि एक रोबोट है। मगर हम इससे ज्यादा कोई निर्णय नहीं निकाल सके थे। अब आगे की कार्रवाई के लिए हमारी सहायता के लिए प्रोफेसर सुरेंद्र मलिक और उनके साथी हमसे जुड़ गए हैं। अब हम उन्हीं से पूछते हैं कि उस टुकड़े से उनकी टीम ने क्या निष्कर्ष निकाला है।"

अनुभव सिंह बैठ गए। सुरेन्द्र मलिक खड़े हुए और उन्होंने कहना शुरू किया-

"जो टुकड़ा हमें दिया गया था, हम अभी उसका अध्ययन कर रहे हैं। उस टुकड़े के अध्ययन के लिए अभी हमें पर्याप्त समय नहीं मिला है। फिर भी जो कुछ अध्ययन हमने किया है उसके आधार पर यह रोबोट इंजीनियरिंग का बेमिसाल नमूना है। इसमें कुछ ऐसी तकनीक भी प्रयोग की गई है जो अभी तक खोजी नहीं गई है। इसका विधिवत अध्ययन होता रहेगा। अभी सबसे पहली आवश्यकता है शहर को इसके आतंक से बचाने की। इसके लिए हमने एक उपाय सोच लिया है। परंतु ये उपाय अभी गोपनीय ही रहना चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है कि इस सभा कक्ष में उपस्थित व्यक्तियों के अतिरिक्त इसके बारे में किसी को भी पता नहीं चलना चाहिए। उपाय है- हमें सबसे पहले यह खोजना है कि ये रोबोट कहां से आता है और कहां वापस चला जाता है। इस काम को करने के लिए हम एक गैजेट तैयार करके आपको देंगे। ये एक तरह का चिप होगा। जिसे प्रयोग करने का तरीका भी उसे देते समय आपको बता देंगे। ये गैजेट आपको रोबोट के ऊपर चिपका देना है। फिर वो रोबोट जहां कहीं भी जाएगा, पुलिस की निगरानी में रहेगा। इस तरह उसे और उसके मालिक को ढूंढना और उसे गिरफ्तार करना आसान हो जाएगा।"

"मगर वो गैजेट रोबोट से चिपकेगा कैसे? क्या वो कोई चुंबक या चुंबक जैसी कोई चीज होगी?"

पुलिस टीम के एक सदस्य ने पूछा।

"गैजेट में चुंबकीय गुण अवश्य होगा। परंतु इसकी हमें आवश्यकता पड़ेगी, ऐसा हमें नहीं लगता। कारण- रोबोट के टुकड़े की इंजीनियरिंग देखने से लगता है कि रोबोट की सबसे ऊपरी पर्त, जिसे हम त्वचा कहेंगे, पर बहुत ही मामूली दूरी तक चुंबकीय या विद्युत-चुंबकीय क्षेत्र अवश्य होना चाहिए। यदि किसी तरह का चुंबकीय क्षेत्र होता है तो वह स्वयं हमारी डिवाइस को अपनी ओर खींच लेगा। और यदि चुंबकीय क्षेत्र नहीं होगा तो डिवाइस स्वयं जाकर रोबोट से चिपक जाएगा। इट्स क्लीयर।"

"ओके।"

"तो ठीक है। हमें ये डिवाइस बनाने में दो से तीन दिन लगेंगे। तब तक आप लोग अपने प्रयास जारी रखिए।"

तीन दिन बाद पुनः उसी सभा कक्ष में सभी लोग एकत्र थे। इस बीच शहर में कोई नई घटना नहीं घटी। इससे यह स्पष्ट हो गया था कि दूबे ने बिल्कुल सही निष्कर्ष निकाला था। कंकाल एक ही था और वो रिपेयर हो रहा था। आज की सभा में सुरेंद्र मलिक कह रहे थे-

"इस डिवाइस को कंकाल तक पहुंचाने के लिए उसके पास तक जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।...।"

सुरेन्द्र मलिक ने सामने मेज पर रखी एक साधारण सी पिस्तौल उठाकर सभी को दिखाते हुए अपनी बात जारी रखी-

"... ये एक साधारण सी पिस्तौल है। इसे आप लोग देशी कट्टे के तौर पर अच्छी तरह जानते हैं। हमने इस पिस्तौल में कुछ मामूली से परिवर्तन किए हैं। इस पिस्तौल की रेंज ५०० मीटर है। यानी आप ५०० मीटर की दूरी से सटीक निशाना लगा सकते हैं। इस पिस्तौल के माध्यम से जो बुलेट आप चलाएंगे वो विशेष है। इसे फायर करने पर इस बुलेट से गोली या छर्रा नहीं निकलेगा। अपितु वो डिवाइस निकलेगी जिसकी चर्चा हमने तीन दिन पहले की थी। ये डिवाइस आपको कंकाल पर इस पिस्तौल से फायर करके चिपकाना है। कंकाल से चिपकते ही ये डिवाइस एक्टिव हो जाएगी। तब आप जीपीएस के माध्यम से कंकाल की लोकेशन पता करके उस वैज्ञानिक तक पहुंच सकते हैं जो इस कंकाल को अॉपरेट कर रहा है।... किसी का कोई प्रश्न?"

सभा कक्ष में सन्नाटा छाया रहा। किसी ने कोई प्रश्न नहीं किया।

"ओके फ्रेंड्स! विश यू बेस्ट ऑफ लक।"

सभा विसर्जित हो गई। वैज्ञानिकों के दल ने १२ पिस्तौलें और ७२ बुलेट अनुभव सिंह को दिये। अनुभव सिंह ने प्रत्येक दल को दो-दो पिस्तौल और बारह-बारह बुलेट वितरित कर दिए। पुलिस की सभी टीमें अपने-अपने क्षेत्रों में गश्त करने निकल गईं। पिछली तीन रातों से कंकाल की तरफ से कोई घटना नहीं घटी थी। इस रात घटी। मगर किसी भी पुलिस टीम से कंकाल का सामना नहीं हुआ। इसी तरह दो रातें और भी निकल गईं। पांचवीं रात इंस्पेक्टर दलबीर सिंह के दल का सामना कंकाल से हुआ। इंस्पेक्टर दलबीर सिंह ने बड़ी सावधानी से कंकाल के इर्द-गिर्द घेरा बनाया। सभी पुलिसकर्मी सावधान थे। दलबीर सिंह ने अपनी विशेष पिस्तौल से फायर किया। निशाना सटीक था। डिवाइस कंकाल की खोपड़ी के पिछले हिस्से से चिपक गया। कंकाल उसी समय गायब हो गया। दलबीर सिंह ने तत्काल इसकी सूचना अनुभव सिंह को दी। अनुभव सिंह ने सारी टीमों को कंकाल की लोकेशन पर पहुंच कर उसका पीछा करने का निर्देश दिया और स्वयं भी कंकाल की लोकेशन की तरफ रवाना हो गए।

रंजन अपनी प्रयोगशाला में बैठा कम्प्यूटर की स्क्रीन पर कंकाल की लोकेशन देख रहा था। अचानक कम्प्यूटर की स्क्रीन पर एक लाल रंग का बिंदु ब्लिंक करने लगा। रंजन पहले तो चौंका। फिर उसने एक अन्य प्रोग्राम खोला। स्क्रीन पर कंकाल का चित्र उभर आया। चित्र ऊपर-नीचे, दाहिने-बाये, अलग-अलग कोणों से कभी ऊपर-नीचे, कभी वामावर्त तो कभी दक्षिणावर्त घूम रहा था। कंकाल का पिछला हिस्सा स्क्रीन पर आते ही लाल बिंदु खोपड़ी पर जाकर ब्लिंक करने लगा। इसे देखते ही रंजन मुस्कराया।

"अनुभव सिंह! तुम्हारा सामना रंजन से है। ... और रंजन तुम्हारा बाप है। तुम सारी जिंदगी खपा दो... रंजन की परछाई तक भी पहुंच नहीं पाओगे।"

रंजन की उंगलियां बड़ी तेजी के साथ की-बोर्ड पर थिरकने लगी।

अनुभव सिंह पूरे दल-बल के साथ कंकाल की लोकेशन का पीछा कर रहे थे। पूरा दल लोकेशन का पीछा करते हुए एक जंगल में पहुंच गया। पुलिस के वैज्ञानिक दल द्वारा बनाया गया डिवाइस एक पेड़ के नीचे पड़ा मिला। कंकाल का कोई अता-पता नहीं था।

"डिवाइस यहां मिला है तो कंकाल भी आस-पास ही कहीं होगा। चारों तरफ फैल जाओ और देखो यहां कोई गुप्त रास्ता वगैरह मिलता है क्या?"

पुलिस दल सुबह होने तक कंकाल को खोजता रहा। परंतु कंकाल क्या, कंकाल का कोई सुराग तक नहीं मिला। हार कर पुलिस टीम वापस लौट गई।

एक बहुत बड़ी, चारों तरफ से बंद ट्रक जैसी गाड़ी रंजन की प्रयोगशाला के सामने खड़ी थी। छोटे-बड़े कई बंद डिब्बे उस गाड़ी में भरे जा चुके थे। रंजन ने डिब्बों को गाड़ी में रखने वाले मजदूरों के ठेकेदार को पैसे चुका कर विदा किया। रंजन के कंधे पर कपड़े का एक मजबूत थैला लटक रहा था। उसे देखने से लगता था कि उसमें कोई वजनी चीज रखी है। ठेकेदार के जाने के कुछ देर बाद रंजन प्रयोगशाला में घुस गया। अपने थैले से एक छोटा सा सिलिंडर जैसा डिब्बा निकाला। यह एक स्प्रे था जिसमें कोई गैस या द्रव भरा था। रंजन ने पूरी प्रयोगशाला में स्प्रे किया और माचिस की एक तीली जला कर फेंक दी। प्रयोगशाला में भक से आग लग गई। रंजन जितनी जल्दी हो सका बाहर निकल गया। आग जितनी तेजी से लगी थी, उतनी ही तेजी से बुझ भी गई। रंजन पुनः प्रयोगशाला में घुसा। दूसरा स्प्रे निकाल कर पूरी प्रयोगशाला में छिड़क दिया। इसके बाद तीसरा स्प्रे छिड़कने के बाद गाड़ी की ड्रायविंग सीट पर जा बैठा। रंजन ने एक दृष्टि प्रयोगशाला पर डाली और जैसे अपने आप से कहा-

"अब ठीक है। अब अनुभव सिंह यहां तक पहुंच भी गया तो भी उसके फरिश्तों तक को भी रंजन दी ग्रेट की हवा भी नहीं मिलेगी।"

रंजन ने गाड़ी स्टार्ट कर दी। गाड़ी कुछ दूर तक जाने के बाद हवा में उठने लगी और देखते ही देखते दृष्टि पथ से ओझल हो गई।



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