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Deepak Kaushik

Drama Inspirational


4  

Deepak Kaushik

Drama Inspirational


लहू पुकारता है

लहू पुकारता है

16 mins 386 16 mins 386

फेमिली काउंसलर ने हार मान कर कमल और रश्मि का केस जज साहब के हवाले कर दिया। दो महीने मुकदमा चलाने के बाद जज साहब ने निर्णय दिया- 'जब पति-पत्नी किसी भी कीमत पर एक साथ रहने को तैयार नहीं हैं तो संबंध विच्छेद स्वीकार किया जाता है। आज से कमल और रश्मि पति-पत्नी नहीं हैं। इनकी दोनों संतानों में बेटी जो छः वर्ष की है पिता को और बेटा जो चार वर्ष का है मां को सौंपा जाता है।'

कमल और रश्मि की राहें उसी दिन से अलग हो गई। कुछ समय तक कमल और रश्मि अपने बेटे-बेटी से मिलने आते रहे फिर वो सिलसिला भी समाप्त हो गया।

विश्वविद्यालय की नोटिस बोर्ड पर नये एडमिशन वाले छात्रों के नामों की सूची लगी थी। नोटिस बोर्ड के सामने अपना नाम खोजने वाले छात्रों की भीड़ एकत्र थी। इस भीड़ में शामिल विराट भी सूची में अपना नाम खोज रहा था। आज पहली सूची जारी हुई थी। थोड़े से परिश्रम के बाद ही विराट को अपना नाम मिल गया। उसके चेहरे पर एक विजयी मुस्कराहट खिल गई। अब उसे अगले दिन ही अपने सारे डाक्यूमेंट लेकर आना था और सारी फार्मेल्टीज़ पूरी करके फीस जमा कर देनी थी। फिर उसके बी.काम. की पढ़ाई के तीन साल के सफर की शुरुआत हो जानी थी।

विराट की कक्षाएं शुरू हुए एक माह व्यतीत हो चुका था। अब तक विराट के यूं तो कई मित्र बन चुके थे मगर उसकी सबसे गहरी मित्रता सुबोध से हुई। विश्वविद्यालय में दोनों लगभग सारे समय साथ ही रहते। साथ कक्षाओं में जाना, साथ ही कक्षाओं से गुठली मारना, साथ ही कैंटीन में जाकर चाय पीना, साथ ही पुस्तकालय जाना। कहने का तात्पर्य यह कि विराट और सुबोध एक-दूसरे के पूरक बन गए थे।

विराट की कक्षाएं प्रथम तल पर लगा करती थीं। एक दिन विराट और सुबोध कक्षा समाप्त हो जाने के बाद भूतल पर आने के लिए सीढ़ियों के करीब पहुंचे ही थे कि अचानक द्वितीय तल से उतरती कुछ लड़कियों के समूह से दोनों का सामना हो गया। लड़कियां कोई दस से बारह की संख्या में रही होंगी। उनमें से एक लड़की पर जो विराट की दृष्टि पड़ी तो जैसे चिपक कर रह गई। लड़की सुंदर थी; मगर अप्सरा नहीं थी। उधर उस लड़की ने भी विराट को देखा तो जैसे कुछ समय के लिए वह स्वयं को भी भूल गई। इधर सुबोध ने विराट का हाथ पकड़ कर खींचा। उधर लड़की को भी स्वयं का भान हुआ और वो स्वयं अपने-आप ही झेंप गई। दोनों समूह अपने-अपने रास्ते चले गए।

अब ये घटना आए दिन घटने लगी। अक्सर विराट और उस अंजान लड़की का आमना-सामना हो जाता। सामना होते ही विराट उसके प्रति प्रबल आकर्षण महसूस करता। मगर एक झिझक विराट को उसके करीब जाने; उससे परिचय करने से रोकती। उसकी इस स्थिति को देख सुबोध उसे छेड़ता-

"बच्चू, तू तो गया काम से।"

"वैसा कुछ नहीं है जैसा तुम समझ रहे हो।"

"तो उसे देखते ही तुम ठिठक क्यों जाते हो ? तुम्हारे कदम ठहर क्यों जाते हैं ? तुम्हारी आंखों में चमक क्यों आ जाती है ? तुम्हारी वाणी को विराम क्यों लग जाता है ? ...जवाब दो।"

"हां! शायद ये सब कुछ मेरे साथ होता है। मगर फिर भी मेरे मन में उसके प्रति कोई गलत भाव नहीं आते। जब भी मैं उसे देखता हूं तो मन करता है मैं उसे देखता ही रहूं। उसे अपने सामने बिठाकर सिर्फ आंखों से बात करुं। उसकी गोद में सर रखूं और सो जाऊं। देर तक सोता ही रहूं।... "

"इसी को प्यार कहते हैं, प्यारे।"

"जरूर कहते होंगे। ... मगर मेरे दोस्त, मैं तो उसके बारे में कुछ जानता भी नहीं। मैं उसके प्रति आकर्षण महसूस करता हूं परंतु वैसा नहीं जैसा तुम सोचते हो। ये एक अजीब सी कशिश है जिसे मैं स्वयं नहीं जानता।"

" उसके बारे में नहीं जानते तो इसमें कौन सी बड़ी बात है। थोड़ी सी मेहनत से उसके बारे में सब कुछ पता चल जाएगा। तुम कहो तो मैं पता लगा कर तुम्हें उससे मिलवा सकता हूं।"

"नहीं मेरे दोस्त! सब कुछ समय पर छोड़ देना चाहिए। जो कुछ अपने-आप पता चल जाए, उसी से काम चलाना चाहिए। वैसे भी हम उसके बारे में पता लगाने चलें और उसे पता चल जाए तो क्या सोचेगी हमारे बारे में।"

"सोचेगी तुम्हारा सिर। कौन से जमाने के प्राणी हो भाई। उसे पता चल जाएगा तो वो यही सोचेगी कि भगवान ने उसे कोई चाहने वाला कोई भेज दिया है। उसकी भी तो कुछ भावनाएं होंगी। कुछ अरमान होंगे।"

"फिर भी। भगवान की इच्छा होगी तो वो स्वयं रास्ते बना देगा।"

"ओके! एज यूं विश।"

विराट ने कह तो दिया मगर उसके मन की तड़प निरंतर बढ़ती ही जा रही थी। कभी-कभी तो उसके मन में प्रबल इच्छा होती कि अपने मन की सारी दुविधाओं, सारी कमजोरियों को ताक पर रखकर उसके सामने जा खड़ा हो और उससे उसका पूरा परिचय जान ले। मगर वो अपने मन की कमजोरियों के आगे विवश हो जाता। कभी भी उसके सामने खड़े होकर उसका नाम तक नहीं पूछ पाता। जब भी वो सामने आती विराट की दृष्टि स्वत: ही झुक जाती और वो चुपचाप अपने रास्ते निकल जाता।

मगर ये स्थिति बहुत ज्यादा दिनों तक नहीं चली। एक माह बाद ही दोनों सीनियर वर्षों के छात्रों ने प्रथम वर्ष के छात्रों को वेलकम पार्टी दी। उस पार्टी में वो लड़की भी उपस्थित थी। परिचय के दौरान विराट ने अपना परिचय विराट रस्तोगी के रूप में दिया तो अपनी बारी आने पर उसने अपना परिचय वैशाली रस्तोगी के रूप में दिया। पूरी पार्टी के दौरान जाने-अनजाने एक-दूसरे के आकर्षण में बंधे रहे। पार्टी के बाद चाय-नाश्ते के दौरान विराट उसके सामने जा खड़ा हुआ। जिस तरह से विराट का घनिष्ठ मित्र सुबोध था उसी तरह वैशाली की अभिन्न सखियां थीं- सुषमा और नीरजा। वैशाली उन्हीं दोनों के साथ खड़ी गप्पे मार रही थी।

"मैं आपसे कुछ बात करना चाहता हूं। कर सकता हूं ?"

"हां-हां, क्यों नहीं ?"

वैशाली ने ऐसे अंदाज में कहा जैसे वो विराट की पहल की प्रतीक्षा कर रही हो।

"इंट्रोडक्शन के दौरान मुझे आपका और आपको मेरा नाम पता चल ही गया है। इसलिए मैं नाम वगैरह नहीं पूछूंगा। सीधे मुद्दे की बात पर आ जाता हूं।..."

इतना कहकर विराट कुछ पलों के लिए रुका। मगर ये कुछ पल वैशाली पर भारी पड़ने लगे। शायद विराट से सार्वजनिक रूप से बात करने में उसे कोई झिझक महसूस हो रही थी। या शायद वो जल्दी से जल्दी विराट की मनोदशा जान लेना चाहती थी।

"आप कुछ कहना चाह रहे थे।"

"हां! दरअसल मैं सोच रहा था कि बात कैसे शुरू करूं।... मैंने जिस दिन आपको पहली बार देखा था उसी दिन से एक अजीब सा खिंचाव महसूस कर रहा हूं। ऐसा लगता है कि जैसे हम और आप अलग-अलग नहीं हैं। कोई न कोई समानता हमारे आपके बीच अवश्य है। मेरे मन में इस तरह की भावनाएं क्यों उत्पन्न हुई हैं, मुझे नहीं पता। बस आपसे बात करने की; आपको जानने की इच्छा अवश्य होती है। यदि आपको आपत्ति न हो तो मैं रोज आपसे मिलना चाहता हूं।"

" सोच कर बताऊंगी।"

"ठीक है। आप अवश्य सोचिए। मगर सोचने में बहुत ज्यादा समय मत लगाईयेगा।"

कहकर विराट अपने मित्रों की तरफ बढ़ गया।

अगले ही दिन विराट और वैशाली का सामना होते ही वैशाली ने कहा-

"मेरे साथ आइये।"

विराट और वैशाली विश्वविद्यालय की कैंटीन में चले गए। कैंटीन में एक मेज पर बैठकर वैशाली ने कहा-

"अब बताइए, आप क्या कहना चाहते हैं।"

"मैं तो बस रोज आपसे मिलना चाहता हूं। ताकि मैं ये जान सकूं कि मैं आपके प्रति खिंचाव क्यों महसूस करता हूं।"

"ठीक है। आप मुझसे यहीं पर मिल सकते हैं।"

इस तरह विराट और वैशाली एक-दूसरे से कैंटीन में मिलने लगे।

एक महीने बाद।

"विराट अपने मम्मी-पापा के बारे में बताओ...।"

वैशाली ने विराट से प्रश्न किया।

"मेरे मम्मी-पापा का बहुत पहले ही तलाक हो गया था। तब मैं बहुत छोटा था। मैं अपनी मम्मी के साथ रहता हूं। और अपने पापा की तो सूरत तक याद नहीं।"

"अच्छा!... तुम्हें अपने पापा का नाम तो पता ही होगा।"

"हां! भला नाम क्यों नहीं पता होगा। मेरे पापा का नाम कमल रस्तोगी है।"

वैशाली चौंक पड़ी। थोड़ा सावधान होकर बैठ गई।

"और मम्मी का ?"

"रश्मि रस्तोगी।"

वैशाली झटके से खड़ी हो गई। उसकी आंखों में हैरानी और स्नेह के मिले-जुले भाव उभर आए।

"क्या हुआ ? आप अचानक खड़ी क्यों हो गईं ?"

"पता नहीं सच जानकर तुम्हें खुशी होगी या दुख। ...पता नहीं।"

"ऐसी कौन सी बात है ?... जो भी हो आप खुलकर बताईए।"

"तुम मेरे भाई हो। सगे, छोटे भाई।"

"क्या ?"

विराट का मुंह आश्चर्य से खुला रह गया। वैशाली की तरह ही वो भी झटके से खड़ा हो गया। इस समय इन दोनों के साथ सुबोध, सुषमा और नीरजा भी बैठे थे। इन तीनों की भी वही मनोदशा थी जो विराट की थी। ये तीनों भले ही उछल कर खड़े न हुए हों मगर आश्चर्य के सागर में गोते लगा रहे थे।

"मेरे मम्मी-पापा का भी बहुत पहले तलाक हो चुका है। मेरी मम्मी का नाम भी रश्मि रस्तोगी और पापा का नाम कमल रस्तोगी है। मैं अपने पापा के साथ रहती हूं। तुम्हारी एक बड़ी बहन भी थी उसकी तुम्हें कुछ याद है ?"

"हां! याद है।"

"तुम्हारी वो बड़ी बहन तुम्हारे सामने है।"

कहते हुए वैशाली आगे बढ़ी और भावावेश में आकर विराट का हाथ पकड़ लिया। विराट भी भावावेश में बहकर वैशाली से लिपट गया। इन पांचों के अतिरिक्त भी कैंटीन में बहुत से छात्र-छात्राएं मौजूद थे। इन दोनों की बातचीत से अंजान उन सभी ने इन दोनों की हूटिंग शुरू कर दी। ऐसे में सुबोध उठ खड़ा हुआ और ताली बजाते हुए जोर से बोला-

"लिसेन फ्रेंड्स! लिसेन। बचपन में बिछड़े हुए सगे भाई-बहन, जो अभी तक एक-दूसरे से अंजान थे, वर्षों बाद आज मिले हैं। जोरदार तालियां बजाकर इनका स्वागत कीजिए।"

सुबोध के इतना कहते ही कैंटीन में तालियों की तड़तड़ाहट गूंज उठी

अगले दिन कैंटीन में पांचों व्यक्ति बैठे चाय का आनंद ले रहे थे, उसी समय विराट ने कहा-

"दीदी! पापा कैसे लगते होंगे ?"

"और मम्मी कैसी लगती होंगी ?"

"ऐसा क्यों नहीं करते कि तुम लोग बारी-बारी से एक-दूसरे के घर जाकर अपने पापा-मम्मी से मिल आओ।"

सुषमा ने सलाह दी।

"नाट ए बैड आइडिया! मगर इसमें मैं एक सलाह और भी दूंगा ‌... "

सुबोध ने कहा। सभी उसकी तरफ कौतूहल से देखने लगे।

"... एकदम अचानक से अपने पापा-मम्मी से मिलोगे तो न जाने उनका कैसा रिएक्शन हो। हो सकता है कि उन्हें, दोनों को या किसी एक को भी किसी तरह का सदमा लग जाए। या तुम्हीं लोगों का न जाने कैसा रिएक्शन हो। उससे बेहतर है कि हम पांचों लोग तुम दोनों के घर चलते हैं। उस समय उन्हें ये नहीं बताना है कि तुम दोनों भाई-बहन हो। यहां तक कि तुम लोग अपना नाम भी नहीं बताओगे। बाद में जैसा उनका रिएक्शन होगा, उसी आधार पर काम करेंगे। ...क्या कहते हो ?"

" तुम्हारा कहना ठीक है। क्यों दीदी ?"

"सुबोध ठीक कह रहा है।"

"तो हम लोग आज ही सारी क्लासेस अटेंड करने के बाद वैशाली के घर चलते हैं।"

"नहीं! आज नहीं। घर पर समय से नहीं पहुंचे तो घर पर सब कोई परेशान होंगे। कल घर पर बताकर आएंगे तब चलेंगे।"

नीरजा ने कहा

"वैशाली! कल तुम्हारे पापा घर पर मिलेंगे ?"

सुबोध ने पूछा।

"हो सकता है कुछ इंतजार करना पड़े। मगर मुलाकात अवश्य होगी।"

इस पर सभी सहमत हो गए और दूसरे दिन वैशाली के घर जाना निश्चित हो गया।

अगले दिन पांचों व्यक्ति वैशाली के घर पहुंचे। घर में घुसने से पहले ही सुबोध ने विराट से कहा-

"वर्षों बाद आज पहली बार अपने पापा से मिलोगे। अपनी भावनाओं पर काबू रखना।"

"हूं ऽऽऽ! हूं ऽऽऽ!! हूं ऽऽऽ!!!"

विराट ने कहीं खोये-खोये से कहा। कुछ ही देर की प्रतीक्षा के बाद कमल रस्तोगी इन लोगों के सामने थे। इनसे बातें कर रहे थे। कैसी विडम्बना थी- पिता सामने था, पुत्र पिता के पैर छूकर आशीर्वाद प्राप्त करना चाहता था, अपने पिता के सीने से लगना चाहता था- मगर कर नहीं सकता था। कैसी विडम्बना थी।

सब कुछ सामान्य ढंग से निपट गया। सुबोध, सुषमा, नीरजा की तरह विराट भी वैशाली के सहपाठी और दोस्त की तरह ही अपने पिता से मिला। उनसे बात की। फिर सभी वापस लौट आए।

अगले दिन वैशाली की बारी थी। वो अपनी मां के सामने बैठी थी। उन्हें अपलक देख रही थी। उन्हें बताना चाहती थी कि वो उनकी बेटी है। उन्हीं के शरीर का हिस्सा। मगर बता नहीं सकती थी। अपनी मां के शरीर से बेल की तरह लिपटना चाहती थी। उनके गालों को चूमना चाहती थी। मगर नहीं कर सकती थी। मन मसोस कर, अपनी भावनाओं को कुचल कर वैशाली अपने साथियों के साथ वापस आ गई।

अगले दिन कैंटीन में-

"अब ?"

वैशाली ने पूछा।

"अब इस बात का खतरा तो नहीं है किसी को भी सदमा पहुंच सकता है। मगर मैं कुछ और ही सोच रहा हूं।"

सुबोध ने कहा।

"क्या ?"

वैशाली ने पूछा।

"पहले मेरे एक प्रश्न का उत्तर दो... तुम्हारे पापा ने दूसरी शादी की ?"

"नहीं। मुझे बहुत अच्छी तरह याद है। पापा से कई लोगों ने शादी के लिए कहा। मगर उन्होंने मेरी वजह से शादी नहीं की। पता नहीं सौतेली मां का मेरे साथ कैसा व्यवहार होगा- पापा हमेशा यही कहकर शादी की बात को टाल जाते थे।"

"और इधर तुम्हारी मम्मी ने भी दूसरी शादी नहीं की। इससे ये निष्कर्ष निकलता है कि दोनों के मन में आज भी एक-दूसरे के लिए जगह है। अगर दोनों को मौका मिले तो शायद मन में जो कुछ मैल है वो धुल जाए और वो फिर से एक हो जाएं। तो क्यों न उन दोनों को मिलाने का प्रयास किया जाय।"

"बात तो ठीक है। मगर ये काम होगा कैसे ?"

विराट ने पूछा।

"मेरे मन में एक आइडिया है। मगर थोड़ा अटपटा सा है। इसलिए पहले तुम लोग सोचो। अगर तुम लोगों को कोई आइडिया आए तो अच्छा। नहीं तो मैं अपना आइडिया बताऊंगा।"

"तुम अपना आइडिया तो बताओ।"

इस बार वैशाली ने कहा।

"मैंने कहा ना, मेरा आइडिया अटपटा है।"

"तुम बताने में इतना झिझक क्यों रहे हो ?"

"बात ही ऐसी है। मेरा आइडिया रामबाण है। लेकिन मुझे लगता है कि इसका प्रयोग सबसे अंत में करना चाहिए। जब सारे उपाय बिना काम आए खत्म हो जाएं। आप लोग सोचिए। शायद किसी को मुझसे भी अच्छा आइडिया सूझ जाए।"

कहकर सुबोध वहां से चलता बना। अगले दिन पुनः कैंटीन में मिलने पर नीरजा ने कहा-

"हम लोगों को तो कोई उपाय नहीं सूझ रहा है। तुम अपना उपाय बताओ।"

"अच्छी बात है, मैं ही बताता हूं।..."

कहकर सुबोध कुछ पलों के लिए रुका।

"तुम दोनों को एक नाटक करना होगा।"

"नाटक! कैसा नाटक ?"

विराट ने प्रश्न किया।

"बताता हूं। ...सुनो। ... तुम दोनों को अपने घर में अपने मम्मी-पापा से कहना है कि तुम लोगों को एक-दूसरे से प्यार हो गया है और तुम दोनों शादी करना चाहते हो। चूंकि तुम दोनों के नाम के आगे रस्तोगी लगा है मगर तुम्हारे मम्मी-पापा को तुम लोगों का असली नाम पता नहीं है इसलिए तुम्हारे मम्मी-पापा को तुम दोनों की शादी में कोई आपत्ति नहीं होगी। इस तरह वो दोनों एक-दूसरे के सामने आएंगे और एक-दूसरे के सामने अपना मन खोलकर रख देंगे। एक बार उनके मन का मैल धुल जाए तो संभव है कि दोनों एक बार फिर एक हो जाएं। तब वो तुम लोगों को तुम्हारे भाई-बहन होने की बात बताएंगे। और तब तुम लोग उन्हें सरप्राइजिंगली बताओगे कि तुम्हें ये बात पता है।"

चारों ने उसकी बात ध्यान से सुनी। थोड़ी ना-नुकुर के बाद सुबोध, सुषमा और नीरजा के समझाने पर विराट और वैशाली ये नाटक करने को तैयार हो गए।

मंच पर जाने से पहले सुबोध, सुषमा और नीरजा ने दोनों को आवश्यक रिहर्सल भी करा दिया। समय आने पर नाटक शुरू हुआ। दोनों को अधिक परिश्रम नहीं करना पड़ा। कमल और रश्मि आसानी से शादी के लिए सहमत हो गए। एक मंदिर में दोनों पक्ष फाइनल सीन के लिए तैयार हो गए। नियत दिन; नियत समय पर कमल और रश्मि आमने-सामने थे। पहले तो दोनों एक-दूसरे को देखकर चौंके। फिर दोनों ने एक-दूसरे का कुशलक्षेम पूछा। अभी तक कमल और रश्मि इस मुलाकात को आकस्मिक मुलाकात समझ रहे थे। क्योंकि विराट और वैशाली दोनों ही बहाने से अपने मम्मी-पापा से अलग होकर सुबोध, सुषमा और नीरजा के साथ छिपे-छिपे नाटक के परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे थे।

"वैशाली कहां चली गई ?"

"क्या ? वैशाली भी तुम्हारे साथ है ?"

"हां!"

"कहां ? कितने बरस हो गए उसको देखे।"

"अभी मेरे साथ ही थी। अभी आती हूं, कहकर गई तो अभी तक आईं नहीं। शायद उसका ब्वायफ्रेंड आ गया होगा। उसी से मिलने गई होगी।"

"क्या वो तुम्हें अपने ब्वायफ्रेंड से मिलवाने के लिए लाई है ?"

"ब्वायफ़्रेंड ही नहीं, उसकी मम्मी से भी।"

"आश्चर्य है! विराट भी मेरे साथ आया हुआ है। वो भी मुझे अभी आता हूं कहकर गया है। और वो भी मुझे अपनी गर्लफ्रेंड और उसके पापा से मिलवाने के लिए लाया है।"

"एक मिनट। ... क्या कहा तुमने ? अपनी गर्लफ्रेंड और उसके पापा से मिलवाने लाया है ?"

"हां।"

"विराट करता क्या है ?"

"बी.काम. प्रथम वर्ष में है।"

"कौन से कालेज में ?"

"विश्वविद्यालय में।"

"और उसकी गर्लफ्रेंड ?"

"उसी के साथ है। उससे दो साल सीनियर है। मगर अच्छी लड़की है। मैं उससे मिल चुकी हूं।"

"वैशाली भी विश्वविद्यालय में है। बी.काम. फाइनल ईयर में। उसका ब्वायफ्रेंड भी उसके साथ ही पढ़ता है। उससे दो साल जूनियर है। मैं भी उससे मिल चुका हूं।"

"तो क्या ?..."

"लगता तो ऐसा ही है।"

इसी समय सुबोध ने विराट और वैशाली को इशारा किया। वो दोनों अपने मम्मी-पापा के पास जा खड़े हुए। कमल और रश्मि ने दोनों को देखा। फिर एक-दूसरे की तरफ देखा।

"वैशाली! तुम्हारी इससे शादी नहीं हो सकती।"

"मैं जानती हूं।"

"तुम जानती हो ?"

"हां! और ये भी जानता है।... सगे भाई-बहन की शादी कैसे हो सकती है।"

"तो तुम लोगों ने ये सब क्यों किया ?"

"आप दोनों को मिलाने के लिए।"

इसी समय सुबोध, सुषमा और नीरजा भी उस जगह पर आ गए।

"कुछ दिन पहले ही हम लोगों को इस बात का पता चला था। उस समय मैं केवल मम्मी को देखना चाहती थी और विराट आपको। इसीलिए हम लोग एक-दूसरे के घर गए। मगर बाद में सुबोध की सलाह से आप लोगों को मिलवाने का खयाल आया। तब हम लोगों ने ये नाटक किया। वैसे ये पूरा नाटक सुबोध के दिमाग की उपज है।"

कमल और रश्मि ने सुबोध की तरफ प्रसंशा भरी दृष्टि से देखा।

"अंकल!... आंटी!... इस अवसर पर मैं आप लोगों से कुछ कहना चाहता हूं। शायद ये छोटा मुंह बड़ी बात हो। कोई बात आप लोगों को अनुचित लगे तो प्लीज दिल पर मत लिजियेगा। आप लोग बरसों से अकेले रह रहे हैं। बरसों पहले आप लोगों का तलाक हो गया। आप दोनों का तलाक किन परिस्थितियों में हुआ, आप लोगों की क्या मनोदशा थी, ये हम लोगों को क्या आपके बच्चों को भी नहीं पता। आपके दोनों बच्चे भी अलग-अलग रहे। अब से कुछ दिन पहले तक ये एक-दूसरे की सूरत से भी अंजान थे। फिर एक दिन अनायास ही इनकी मुलाकात हुई। मुलाकात होते ही इनके लहू ने जोर मारा और ये दोनों एक-दूसरे की तरफ खिंचने लगे। फिर एक दिन अनायास ही एक घटना और भी घटी। इन दोनों को पता चला कि ये सगे भाई-बहन हैं। मान लीजिए कि इन्हें इस बात का पता न चलता और ये सचमुच में एक-दूसरे से प्यार कर बैठते तो ? ... और यदि भावनाओं में बहकर गलत कदम उठा लेते तो ?... क्या आप लोगों को ऐसा नहीं लगता कि उस परिस्थिति में आप लोग ज्यादा दोषी होते। ..."

सुबोध कुछ पलों के लिए रुका। कमल और रश्मि का मस्तिष्क जड़ हो गया। सचमुच ये एक ऐसी सच्चाई थी जिसके ऊपर कमल और रश्मि ने कभी विचार नहीं किया था। इन दोनों ने ही क्यों, तलाक लेकर जन्म-जन्मांतरों के बंधन को तोड़ देने वाला कोई भी व्यक्ति नहीं सोच पाता होगा। इतना ही सोच ले तो तलाक लेकर अलग हो जाने के बजाय दाम्पत्य जीवन में आने वाले तनाव को दूर करने का प्रयास न करें। अपनी संतानों के भविष्य को संवारने का प्रयत्न न करें।

"तुम ठीक कह रहे हो बेटे! हम लोग इतनी गहराई से नहीं सोच पाए थे।"

"ठीक है। जो हुआ सो हुआ। अब आप लोग साथ में रहिए। वैशाली और विराट दोनों को आप दोनों की जरूरत है। आपके प्यार की आपके संरक्षण की जरूरत है। बस यही कहना चाहता हूं। विश यू बेस्ट ऑफ लक।"


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