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Bhagvatkinkar akashrjnath

Horror


4.4  

Bhagvatkinkar akashrjnath

Horror


निळावंती, एक अनसुलझा रहस्य

निळावंती, एक अनसुलझा रहस्य

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वह एक ऐसा ग्रंथ था जिसे पढ़ने से मनुष्य काल का ज्ञाता बन जाता था। ना जाने कितने ही लोग उसे खोजते हुए मृत्युपंथ को लग गये। जो लोग काल का ग्रास बन गये उन सब में एक समानता थी की वे उस ग्रंथ का हेतु अथवा उपयोग ही जानते थे। असल में किसी को भी उस ग्रंथ का ठिकाना मालूम नहीं था। सभी ने अपने अपने तरीके से उसे खोजने में अपनी जिंदगी लगा दी थी पर कामयाब एक भी न हुआ था।

काल पर नियंत्रण रखने की चाह उतनी ही पुरानी है जितनी मनुष्य को काल की समझ है। जब मनुष्य ने काल के रहस्य को जान लिया है तब से वह उसपर नियंत्रण रखने की उसके साथ आगे-पीछे सफर करने की ख्वाहिश पाले हुए है। वास्तव में काल जिसको समय कहा जाता है बहुत पेचीदा चीज है। उसके साथ थोड़ी सी छेड़छाड़ इतिहास बदल देती है। लेकिन यह सच है की अगर आप वह कर पाये तो आप वह कर ही नहीं पायेंगे क्योंकी आप समय में पीछे गये और आपने कुछ घटनायें बदल दी तो आगे का पूरा इतिहास बदल जायेगा और इतिहास के साथ आप भी, मतलब आप इतिहास बदलने के लिये गये यह परिस्थिति ही उत्पन्न नहीं होगी इसका सीधा अर्थ यह है की आपने समय बदला ही नहीं मतलब इतिहास वैसा का वैसा ही है। इसी जगह उस ग्रंथ का काम शुरू होता है लोग खुद समय बदलने की सोचते है लेकिन यह ग्रंथ पढ़नेवाले को यह ताकत देता है की वह चाहे जिसके माध्यम से समय को बदलवा सकते है। उसे वह शक्ति प्राप्त होती है जिससे वह दूसरे का इतिहास बदल सके। लेकिन यह सब सुनी सुनाई बाते है आज तक किसी ने अपनी आँखों से उस ग्रंथ को नहीं देखा सिर्फ उसका नाम और उसके कारनामे सुने है। उस ग्रंथ का नाम है "नीळावंती"। महाराष्ट्र के किसी भी गाव मे जाकर आप किसी बूढ़े को पुछेंगे तो वह अवश्य आपको नीळावंती के बारे में बतायेगा। और साथ में यह चेतावनी भी की उसके पढ़ने से पढ़नेवाले का वंश नष्ट हो जायेगा। सबसे महत्वपुर्ण बात यह ग्रंथ पढ़ने से पढ़ने वाले को पशु पक्षियों की भाषा समझने लगती है।

तांत्रिकों में यह हमेशा से माना जाता रहा है की पशु-पक्षियों का समय मनुष्यों के समय से अलग तरह से चलता है। मनुष्यों के लिये जो काल एक दिन का होता है वही चींटीयों के लिये कई सालों का हो सकता है। और दूसरी मान्यता यह है की समय को समय जितना ही सूक्ष्म होकर परिवर्तित किया जा सकता है। यह सब तब की बाते है जब वह ग्रंथ मिल जाये और उसे पढ़ने की कला अवगत हो। क्योंकी वह ग्रंथ मिल भी जाये तो वह किसी मानवीय लिपी में नहीं है पैशाच लिपी मे लिखा हुआ है। पैशाच लिपि को जानने वाला कोई भी मनुष्य इस सृष्टि मे नहीं है। कहा ये भी जाता रहा है की हिमालय की गुफा-कंधराओं में बैठे साधु-मुनियों में से कइयों को वह रहस्यमयी लिपी आती है लेकिन वह कहाँ है यह भी कोई नहीं जानता। तो पुरी बात यह है की वह ग्रंथ कैसा है यह भी कोई नहीं जानता, ना वह कहाँ है यह, ना उसके पढ़ने का तरीका ही। लेकिन उस ग्रंथ से क्या किया जा सकता है यह जानने से ही कोई भी उसे खोजने के लिये प्रवृत्त हो जाता है, कोई भी का मतलब जिसे किसी अलौकिक कार्य में अति रुचि हो।

ग्रंथ को खोजने का पहला चरण यह था की ग्रंथ की खोज कहाँ से शुरु करे। जिन्होंने उस ग्रंथ के बारे में सुना है उन्होंने भी उन से सुना है जिन्होंने उस ग्रंथ के बारे में सिर्फ सुना है देखा नहीं है। और ऐसे ही यह शृंखला पता नहीं कहाँ तक जा सकती है।

“नीळावंती" के बारे में और एक बात प्रसिद्ध थी की उसे जाननेवाला एक मनुष्य आज भी जीवित है उसे लोग बाजिंद कहते है और वह महाबळेश्वर के जंगलों में रहता है कहते है उसकी आयु १००० वर्ष से भी ज्यादा है। अब सबसे आसान तरीका तो यह है की पहले बाजिंद को खोजा जाये जो उसे जानने वाला है और उसके पास से जो जानकारी मिले उसके आधार पर "नीळावंती" की खोज करे। और एक बात आप को बता दू जो लोग "नीळावंती" के पीछे थे वह चाहे जिस भी काल में हुये हो या फिर किसी भी जगह से हो उन मे एक और समानता थी वे सभी महाबळेश्वर के जंगलों में जाते देखे गये थे। उनमें से केवल दो लोग ही जाने के बाद फिर से देखे गये थे वह भी मृत अवस्था में। बाकियों का जिनकी संख्या सैकड़ों में हो सकती है क्या हुआ किसी को नहीं पता क्योंकी उनका ना शरीर मिला था ना कोई अवशेष।

अब इतनी जानकारी मिलने के बाद क्या आप अब भी चाहते है की आप भी उस ग्रंथ की खोज करने जाये। तो मैं आप को उस आखरी इंसान के बारे में बताता हूँ जो नीळावंती की खोज मे गया था। शायद आपको कोई काम की बात मिल जाये जो आपको नीळावंती खोजने में काम आ जाये।

उसका नाम रावसाहेब था। वह रत्नागिरी के पास एक गाव का जमीनदार था। मुँह मे चांदी का चम्मच लेकर जन्म हुआ था कमी किसी बात की नहीं थी। मल्ल थे इसलिये बल भी था। धन और बल दोनो से वह अपने सामने हर किसी को झुकाना पसंद करता था। बहुत अमीर होने के बावजूद उसे एक बात की कमी हमेशा खलती थी। एक ऐसी बात जिससे सब सुख होने के बाद भी उसकी कई पुश्तों को अफसोस के साथ जीने के लिये मजबूर किया था। इस बात का पता चलते ही वे एक ही बात सोचने लगते थे की शायद यह किसी तरह से बदला जा सके। वह बात यह थी की उसके खानदान मे बहुत पहले किसी ने केवल गलतफहमी के कारण सात कुएँ भरे जाते इतना सोना और हीरे जवाहरात समुद्र मे डुबा दिये थे। उन्हें अफसोस इसी बात का होता था की काश वह बात बदली जा सकती तो आज दुनिया के सबसे अमीर इंसानों में गिने जाते पर ऐसा तभी हो सकता था जब समय मे पीछे जाकर उस गलतफहमी को दूर किया जा सके।

रावसाहेब को पहले यह बात पता नहीं थी की समय में पीछे जाया जा सकता है। क्योंकी बुद्धिमान मनुष्य इस तरह की बात सोच भी नहीं सकता जो असंभव हो। पर जैसा की उसके पहले कई पुश्तों ने किया था केवल वह उस धन का पता लगाना चाहता था। उसके लिये उसने भी उन्हीं तरीकों को अपनाया था जिसे उसके पुश्तों ने अपनाया था। जैसे ज्योतिषियों, तांत्रिकों, मांत्रिकों के माध्यम से धन का पता लगाना। लेकिन बहुत कुछ कर के भी कुछ हासिल नहीं हो सका था। समय और पैसा दोनों बरबाद हो रहे थे। लेकिन उस अमर्याद धन के आगे इस धन की कोई कीमत नहीं हो सकती थी। और ऐसे में ही एक दिन रत्नागिरी में एक अद्भुत मांत्रिक आया। लोग कहते थे की उसने पिशाच्च वश किया हुआ है। जो उसका हर एक हुक्म मानता था।

रावसाहेब को उसमें रूचि नहीं होती यह कैसे हो सकता था। रावसाहेब भी रत्नागिरी चला गया और उस मांत्रिक को मिला। पहले ही मुलाकात में मांत्रिक ने रावसाहेब पर ऐसी छाप छोड़ी की उसने मांत्रिक को अपने हवेली पर बुलाया। मांत्रिक आने के लिये कबूल हो गया। दो दिन बाद ही मांत्रिक रावसाहेब की हवेली पर था। उसकी अच्छी मेहमाननवाजी की गयी। हर तरह से उसे प्रभावित करने की कोशिश हो रही थी। इसलिये की रावसाहेब ने यह भी सुना था की मांत्रिक के पास अंजन बनाने की विधि है। प्राचीन काल से ही लोगों में यह बात प्रचलित है की किसी तरह का रासायनिक काजल जिसे अंजन कहते है वह आँखो पर लगाने से जमीन के नीचे दबा हुआ खजाना दिख जाता है। वही पाने के लिये रावसाहेब इतने यत्न कर रहा था।

एक हप्ता निकल गया पर मांत्रिक ने कुछ नहीं कहा वह तो अच्छे भोजन और मुलायम गद्दों का आनंद ले रहा था। रावसाहेब के सब्र का बांध टूटने लगा था लेकिन फिर भी अगर मांत्रिक को बुरा लगा तो कही ये मुझे शाप ना दे दे इसलिये उसने चुप बैठना ही ठीक समझा। रावसाहेब का यह धैर्य व्यर्थ नहीं गया। दुसरे दिन मांत्रिक और रावसाहेब एक कमरे में अकेले बैठे थे तब मांत्रिक ने रावसाहेब से पुछा की उसे उससे क्या चाहिये। तब रावसाहेब ने अपनी इच्छा और उस खानदानी खजाने के बारे मे मांत्रिक को बताया।

मांत्रिक की आँखें चमक उठी, उसने जिंदगी मे कभी इतने खजाने के बारे मे नहीं सुना था। लेकिन उसने अपने चेहरे को निर्विकार रखा उससे जाहिर नहीं होने दिया की उसे भी खजाने की लालसा है। उसने रावसाहेब को अपना इतिहास बताना शुरू किया की कैसे वह मांत्रिक बना। उसने जो बताया वह यह था,

"मैं भी पहले एक सीधा साधा किसान था। मेरा नाम बाबु था। मेरी शादी हो चुकी थी लेकिन माँ-बाप में से कोई भी तब जीवित नहीं था। मेरे पास कुछ बीघा जमीन थी उससे ही अपना गुजारा करता था। एक शाम मैं खेत से लौट रहा था तो मुझे अपने दोस्त जो आग जलाकर उसके पास बैठकर गप्पे लड़ा रहे थे वे दिख गये। उन्होंने भी उन्होंने भी मुझे देखा और आवाज लगाई कहा की मैं भी थोड़ी देर उनके साथ बैठूं काम तो रोज का लगा ही रहेगा। मुझे भी यह बात ठीक लगी की आदमी को थोड़ा समय खुद के लिये भी निकालना चाहिये। घर में बीवी राह देख रही होगी यह बात तो मेरे दिमाग में थी लेकिन फिर मैंने सोचा की एकाद दीन थोड़ी देर हो गई तो क्या हो जायेगा कोई बहाना बना लेंगे। गप्पे लड़ाते लड़ाते समय का ध्यान ही नहीं रहा बहुत देर हो गई। मैं गाव के बाहर रहता था। मैंने अपने दोस्तों से इजाज़त मांगी और अपने रास्ते लग गया। मुझे खेत जाने के लिये पूरा गाँव पार करना पड़ता क्योंकि मेरे घर और खेत के बीच मे गाव था। और एक बात थी मुझे डर बहुत लगता था, और मेरे घर जाने के रास्ते में श्मशानभुमी थी। मैं घर इसलिये जल्दी जाता था की रात को श्मशान के पास से गुजरना ना पड़े लेकिन उस दिन मुझे बहुत देर हो गई थी।

मैने जैसे तैसे अपने मन को तैयार किया क्योंकि आगे श्मशानभुमी यानी भूतों का इलाका शुरू होने वाला था। मुझ जैसे डरपोक इंसान के लिये यह बात बहुत गंभीर थी। मैं तेजी से अपने कदम बढाने लगा। मुझे बस अपने घर पहुँचना था। अब श्मशान भुमी शुरू हो गई थी। मैं मन में रामनाम जपने लगा। अचानक से अंधेरा बहुत घना हो गया। मेरा डर अब चरमसीमा तक पहुँच गया। मुझे अब इतना ज्यादा डर लग रहा था की अब इसी डर की वजह से मेरी मौत ना हो जाये इस बात की चिंता हो ने लगी थी।

श्मशान के सन्नाटे को उल्लुओं कि आवाज भंग कर रही थी। जिससे माहौल और डरावना हो गया। तभी अचानक से किसी के चीखने की आवाज आई। डर की एक तेज लहर मेरे सीने से दौड़ गई। मैं जगह पर ही खड़ा रहा। दूर कही कुछ चमक रहा था। लगता था किसी की चिता जल रही थी। अब मेरी हालत इतनी गंभीर हो गई की मेरे सीने में तेज दर्द होने लगा। मेरी सांस तेजी से चलने लगी और धड़कनें सामान्य से दुगनी हो गई। मुझे फिर से वैसी ही चीख सुनाई दी कम से कम मुझे तो ऐसा ही लगा लेकिन वह चीख नहीं थी वह तांत्रिक उसे पुकार रहा था। मैं सोच में पड़ गया की क्या करना चाहिये क्या मुझे तांत्रिक के पास जाना चाहिये या अपनी जान बचाकर भागना चाहिये। मैंने निर्णय कर लिया की वह अपनी जान बचायेगा। मैं भागने लगा मुझे जल्दी से अपने घर जाना था जहाँ मैं खुद को महफूज मानता था। थोड़ी ही दूर गया था की वह तांत्रिक मेरे आगे ही प्रकट हो गया। अब तो मुझे लगा की मैं पक्का मर जाऊँगा। लेकिन तांत्रिक ने अपना अंगूठा मेरे माथे पर लगाकर उसे शांत किया। मुझे बहुत आश्चर्य लग रहा था की मेरा डर ना जाने कहाँ गया था।

उस तांत्रिक ने मेरा हाथ पकड़कर उस जलती हुई चिता के पास लेकर गया। मैंने देखा वह चिता कम और हवनकुंड ज्यादा लग रहा था। उसके आस-पास बहुत सी अजीबोगरीब चीजे रखी हुई थी। उसमें से कुछ तो भयानक भी थी जैसे की इंसान की खोपड़ी, खून से भरे प्याले, अलग अलग मिट्टी के बर्तनों में कई पशुओं के अंग भर कर रखे हुए थे। मुझे समझ नहीं आ रहा था की ये सब चल क्या रहा है। मैंने तांत्रिक को पुछने का सोचा लेकिन तांत्रिक ने जैसे मेरी इच्छा भाँप ली। उसने उँगली मुँह पर रखते हुए इशारे से चुप रहने के लिये कहा। मैं बहुत देर तक बैठा रहा जब तक की उस तांत्रिक ने सारी विधियाँ पुरी नहीं की। अब मध्यरात्री हो रही थी, रात शायद अमावस की रही होगी। तांत्रिक उसकी विधि पुरी होते ही वहाँ से उठा और उसने मुझसे कहा की उसे आगे की विधि करने के लिये किसी स्त्री की बली देनी होगी जिसको अब तक बच्चा ना हुआ हो। मेरा दिल दहल उठा उसको लगा की वह किस मुसीबत मे पड गया है।

मुझे बच्चा नहीं हुआ था और मेरी बीवी घर पर थी। मैं एक साधारण किसान था मेरी और मेरी पत्नी का ना कभी झगड़ा होता था ना वह मुझे किसी बात के लिये तंग ही करती थी। उस तांत्रिक के पास ना जाने कौन सी ऐसी शक्ति थी की मैंने उसे अपनी बाँझ बीवी के बारे में बताया। बताते समय भी मुझे लग रहा था की यह ठीक नहीं है मुझे ऐसा नहीं करना चाहिये लेकिन मेरी जुबान अब मेरे नहीं किसी और के बस में थी।

तांत्रिक ने जैसे ही मुझ से मेरी बीवी के बारे में सुना तो वह खुश हो गया। उसने मेरे हाथ में एक बहुत बड़ा छुरा दिया और कहा की अपनी बीवी को यहाँ ले के आओ या फिर उसका सिर काट कर ले के आओ। साथ मे एक इंसान की खोपड़ी भी दी और कहा की यदि बीवी साथ में नहीं आती और अगर मैं सिर काटने का फैसला लेता हूँ तो जैसे ही गर्दन पर छुरा लगाऊँ तुरंत इस खोपड़ी में खून जमा करूँ बिना एक भी बूँद जमीन पर गिराये। मैंने छुरा हाथ में पकड़ लिया मुझे आश्चर्य हो रहा था की मैंने ऐसा क्यों किया।

मैं घर की तरफ जाने लगा जहाँ मेरी बीवी सोच रही होगी की उसका पति हर रोज दिन ढलने से पहले खेत से लौट आता है लेकिन आज ऐसा क्या हुआ की मध्यरात्री के बाद भी वह नहीं आ पाया। शायद उसने बहुत देर तक मेरी राह देखी थी और वैसे ही दरवाजे के पास सो गई। मेरा घर सुनसान इलाके में नहीं था। मेरे घर के आसपास भी थोड़ी दूरी पर कई घर बनाये हुये थे। लेकिन देहातों में लोग जल्दी सो जाते है तो दो चार कुत्तों के अलावा कोई दिख नहीं रहा था। हालाँकि कुत्ते कोई नया इंसान गुजरने पर भौंकते जरूर थे लेकिन मुझसे उनकी पहचान थी इसलिये वह हिले तक नहीं।

मैं अपने घर की तरफ बड़ा। दरवाजा अंदर से बंद नहीं किया था। घर में कुछ था ही नहीं तो चोरो का कैसा डर। सिर्फ आगे धकेला हुआ था। मैंने सोचा यह अच्छा हुआ। अगर दरवाजा बंद होता तो बीवी जाग जाती जिससे सारा पासा पलट सकता था। बीच बीच मे मुझे हैरानी भी हो रही थी की मैं इतना निर्दयी कैसे हो सकता हूँ जो किसी तांत्रिक के कहने पर अपनी बेगुनाह बीवी को बेवजह मार डाले। लेकिन यह मेरा दिमाग सोच रहा था शरीर की कृती इससे बिलकुल विपरीत। जैसे कोई और मेरे शरीर को चला रहा हो।

मैं दरवाजा धकेल कर अंदर गया तो वही पर मेरी बीवी सोती हुई दिख गई। मेरा दिमाग जोर जोर से चिल्लाने को चाहता था। मैं चाहता था की बीवी को चिल्लाकर उठा दूं और भाग जाने के लिये कहुँ। लेकिन मैं कुछ नहीं कर पाया। मैंने धीरे से छुरा और खोपड़ी बगल में रख दी अब मेरे हाथ बहुत सफाई से बीवी का गला घोट रहे थे। मेरी अभागी बीवी को आँखें खोलने तक का मौका नहीं मिला। वह छुटने के लिये बहुत छटपटाई लेकिन सिर्फ कुछ पल के लिये और फिर सब कुछ शांत हो गया। बाबु का मन बहुत व्याकुल हो गया लेकिन शरीर से वह वैसा ही निर्विकार था।

मैं अपने घर में थैला ढूँढने लगा जिसमें छुरा और खोपड़ी रख सकूँ। मुझे थैला मिल गया मैंने थैले मे छुरा और खोपडी रखी। थैला कंधे पर लटका दिया। फिर धीरे से अपनी बीवी का शव उठाकर कंधे पर लिया और घर से बाहर आया। बाहर से कुंडी लगाकर घर बंद किया और श्मशान की ओर बढा जहाँ वह तांत्रिक मेरी राह देख रहा था। श्मशान मे पहुँचने के बाद मैंने अपनी बीवी का शव उस हवनकुंड के पास लिटा दिया और तांत्रिक को कहा की मैं उसकी गर्दन काटने का धैर्य नहीं कर पाया। तांत्रिक ने कहा की वह यह काम खुद कर लेगा।

तांत्रिक ने मुझे बैठने का इशारा किया और उसने दूसरी विधि प्रारंभ कर दी। उसने मेरी बीवी के शव की मांग भरी। हवनकुंड की अग्नी जब बहुत ज्यादा प्रज्वलित हो गई तो उसने बड़ी सफाई के साथ मेरी बीवी का सर धड़ से अलग कर दिया। खून की धारा बहने लगी जो तांत्रिक ने पहले से ही नीचे पकड़े इंसानी खोपड़ी में गिर रही थी क्योंकि उसे मरे ज्यादा देर नहीं हुई थी तो खून अभी भी गरम था। जब खोपड़ी खून से पुरी भर गई तो तांत्रिक ने आधे से ज्यादा खून हवनकुंड मे डाल दिया। थोड़ा खून जो बचा हुआ था वह उसे कुछ मंत्र बोलने के बाद घुँट-घुँट कर पीने लगा।

मैं बिलकुल सुन्न हो गया। ऐसा अघोरी कृत्य मैंने कभी सपने में भी नहीं देखा था जैसा मेरी नजरो के सामने घट रहा था। तांत्रिक ने खुन पीने के बाद उसी छुरे से मेरी बीवी गले से नाभी तक एक चीरा लगाया और उसमें हाथ डाल कर दिल, आँतें, गुर्दा आदि अंग निकाल निकाल कर उस अग्नि मे डाल रहा था साथ ही भयानक आवाज में मंत्रों के उच्चार भी कर रहा था। यह सब अगले एक घंटे तक चलता रहा जब मेरी बीवी के कपड़ों के अलावा कुछ नहीं बचा तब यह सब थम गया। अब श्मशान का सन्नाटा महसूस होने लगा था। कभी कभी चट चट आवाजें करती हवनकुंड की लकड़ियों की आवाज के अलावा कोई हलचल नहीं हो रही थी। अग्नि पहले से ज्यादा धु धु कर जल रहा था। तभी घना कोहरा छाने लगा लेकिन सिर्फ मेरे और तांत्रिक के आसपास जैसे एक घेरा बन रहा हो। हवनकुंड से एक भयानक पिशाच्च प्रकट हो गया उसने तांत्रिक से कहा की वह उसका कोई भी हुक्म मानेगा और पुछा की अभी उसे क्या करना है। तांत्रिक ने कहा की फिलहाल उसको कुछ नहीं करना है लेकिन जब मैं बुलाऊँ तब उसे आना होगा। पिशाच्च ने ये बात मान ली और वह उसी तरह उस कोहरे में गायब हो गया जैसे वह आया था।

तांत्रिक ने मुझसे कहा की हमें अब यहाँ से निकलना होगा क्योंकि थोड़ी ही देर में सूरज निकल जायेगा और यदि किसी ने हमें यहाँ देख लिया तो बहुत हंगामा हो जायेगा। तांत्रिक ने सारा सामान समेट लिया और मुझसे भी कहा की वह वहाँ मौजूद हर एक निशानी को मिटा दे जिससे वहाँ घटी घटनाओं के बारे मे पता चल सकता हो। मैंने भी वही किया जो मुझसे कहा गया।

सब हो जाने के बाद तांत्रिक श्मशान के पीछे के रास्ते से निकलने लगा उसने मुझे भी अपने साथ आने के लिये कहा। हवनकुंड और बाकी सब तांत्रिक विधिओं की चीजे हटाने के बाद से ही मैं पहले जैसा बन गया था और डर से कांपने लगा था। मुझे समझ मे आ गया की मेरे हाथ से कितना बड़ा गुनाह हुआ है। मैं तांत्रिक को पुछने लगा की मेरे साथ उसने क्या किया था लेकिन तांत्रिक ने जवाब दिया की अगर मैं उसके साथ चलूँ तो मुझे सब कुछ बता दिया जायेगा। वैसे भी अब वहाँ पर रहना मेरे लिये अच्छा नहीं होता यही सोचकर मैं उसके साथ चल पड़ा ।

लगभग चार दिन तक सफर करने के बाद हम दोनों रात को उस खंडहर में पहुँचे जहाँ वह तांत्रिक रहता था। मैंने वहाँ पर देखा तो वहाँ भी वैसी ही अघोेरी चीजें दिखाई दी जैसे श्मशान में थी। फर्क यह था की तब मैं उन सब का हिस्सा नहीं था लेकिन अब ना चाहते हुए भी वह मेरी जिंदगी में दाखिल हो चुकी थी। यह मेरी भविष्य का हिस्सा बनने वाली थी। हम दोनों ही बहुत थक चुके थे हालाकी हमने बीच-बीच मे रूक कर थोड़ा सा आराम किया था लेकिन वह हमारी थकान दूर करने के लिये काफी नहीं था। इसलिये आते ही तांत्रिक और मैं दोनों सो गये। सूरज माथे पर आया तब जाकर तांत्रिक की आँखें खुली वह उठा और साथ में मुझे भी उठाया। हम दोनों नदी पर जाकर स्नान करके आये। हम दोनों को भूख भी बहुत लगी थी क्योंकि चार दिनों से बहुत थोडा अन्न पेट में गया था। लेकिन वहाँ पर ना चूल्हा था ना भोजन की और कोई व्यवस्था। लगता था की तांत्रिक वहाँ से कई महीनों के लिये बाहर आया था। तभी तांत्रिक ने जोर से पुकारा "सुलेमान"। चार दिन पहले अमावस की रात को एक स्त्री की बली देकर जिस पिशाच्च को वश किया था वही पिशाच्च आगे आकर खड़ा हो गया और पुछने लगा की उसके लिये क्या आदेश है।

तांत्रिक ने उसे सबसे अच्छा खाना और पीने के लिये महंगे से महंगे पेय लाने के लिये कहा। पिशाच्च ने सिर्फ चुटकी बजाई और जिन चीजों की माँग की गई थी वह चीजे सामने थी। यह देखकर मेरी आँखें खुली की खुली रह गई। मैं समझ गया की क्यों तांत्रिक ने इसे वश करने के लिये इतनी मुसीबत मोल ली थी। वह कोई भी इच्छा पूर्ण कर सकता था। हम दोनों ने भरपेट खाना खाया और साथ में शरबत, ठंडाई का भी स्वाद लिया।

मैंने तांत्रिक को याद दिलाया की उसने साथ चलने पर सब कुछ बताने का वादा किया था। तब तांत्रिक ने बताना शुरू किया।

“मेरा जन्म कहा हुआ था यह तो मुझे याद नहीं है लेकिन मुझे एक अघोरी ने पाला था जिसका नाम चंद्राबाबु था। अघोरी वह तांत्रिक जमात होती है जो नरमांस का भक्षण करते है। क्योंकि मैं अघोरी के साथ रहता था इसलिये हर कोई मुझसे डरता था। वैसे मेरा कोई नाम नहीं रखा गया था लेकिन चंद्राबाबु मुझको कन्नम कहकर पुकारता था। बचपन से ही नरबली और पशुबली को देखते देखते मेरी जैसे आत्मा मर गई थी। उस अघोरी के साथ रहने से मैं भी अघोरी ही बन गया था। मरने से पहले चंद्राबाबु ने मुझको पिशाच्च वश करने की विधि बताई और कहा की यदि किसी भी तरह से तुम्हारा गुजारा ना चले तभी पिशाच्च वश करने की सोचना तब तक नही। क्योंकि पिशाच्च वश करने के लिये तुम्हें वह करना पड़ेगा जो आज तक तुमने कभी नहीं किया। किसी गाव की श्मशानभुमी मे जाकर पहले बकरे, कुत्ते और मुर्गे की बली चढानी होगी और फिर किसी बाँझ स्त्री की उसी के पति के माध्यम से बली चढ़ानी होगी। यदि तुम इसमें सफल हुए तो पिशाच्च वश हो जायेगा और तुम्हारी हर एक इच्छा पुरी करेगा। उस पिशाच्च को हमेशा के लिये अपने हुक्म मे रखने के लिये हर अमावस को तुम्हें एक बच्चे की बली चढ़ानी होगी। तभी वह तुम्हारा हर एक हुक्म मानेगा नहीं तो तुम्हारी बली लेकर वह फिर से अदृश्य हो जायेगा। यह कहकर चंद्राबाबु ने घंटे भर बाद आखरी साँस ली।

बीस सालो तक मैं खुद का पेट भरने के लिये भटकता रहा। क्योंकि मैं सिर्फ अघोरी के साथ रहता था लेकिन मुझे सभी तांत्रिक क्रियायें नहीं आती थी तो मेरा गुजारा मुश्किल से ही हो पाता था। तो मैंने अब पिशाच्च वश करने की सोची और साल भर से मैं किसी की तलाश कर रहा था। हर ऐसे गाव मे जाकर जहाँ बाँझ औरतें है मैंने यह विधि पुरी करने का प्रयत्न किया लेकिन सफल नहीं हो सका। फिर मैं तुम्हारे गाव में आया मैंने एक पूरा सप्ताह तुम पर नजर रखी और फिर यह विधि आयोजित की जिसमें मैं पुरी तरह से कामयाब हो गया।"

"अब मुझे एक सहाय्यक की आवश्यकता है और मेरे लिये यह काम तुम करोगे। मैं तुम्हारी हर एक इच्छा पुरी कर सकता हुँ यह तुम अच्छी तरह से जानते हो। और जब मेरा अंतसमय आ जायेगा तब मैं यह पिशाच्चा तुम्हें ही सौंप दूंगा। इसके बदले तुम्हें सिर्फ इतना करना होगा की हर महीने की अमावस को बली देने के लिये एक बच्चा तुम्हें लाना होगा।" कन्नम ने बात पुरी की।

मैंने उससे पुछा की यह काम वह पिशाच्च से क्यों नहीं करवाता तो उसने कहा की यही एक काम है जो पिशाच्च नहीं कर सकता हमें पिशाच्च के लिये करना पड़ेगा। मैं मन में बहुत डर गया था। मैं सोचने लगा की जब मैंने अपनी बीवी का कत्ल किया था तब मैं होश में नहीं था और मेरा खुद पर काबू भी नहीं था। लेकिन अब मैं पूरे होश में था और ऐसा घिनौना काम फिरसे नहीं करना चाहता था। तो मैंने सोचा की जैसे तैसे इस तांत्रिक से अपना पीछा छुड़ा लूं फिर देखा जाये की क्या होगा।

अमावस की रात जैसे जैसे करीब आने लगी वैसे वैसे कन्नम मुझे किसी बच्चे को लाने के लिये पीछे पड़ गया। मैंने भी कह दिया की मैं एक बच्चे को चुन चुका हूँ और बड़ी आसानी से मैं अमावस को उसे वहाँ लाऊँगा वह बली की तैयारी की तरफ ध्यान दे। इतना कहने पर भी तांत्रिक निश्चिंत नहीं हुआ था। क्योंकि यह उसके जिंदगी और मौत का सवाल था। उसने मुझे उसी दिन उस बच्चे को हाजिर करने को कहा। मैंने कहा ठीक है और बाहर निकल पड़ा दो दिन बाद ही अमावस थी। लेकिन मैं वापिस उस जगह तभी गया जब अमावस हो चुकी थी। मैंने वहाँ जाकर देखा की कन्नम का सिर्फ शरीर पड़ा है जिसका सर नहीं है तो मैं समझ गया की अमावस को पिशाच्च अपनी बली लेने के लिये आया होगा और ना मिलने पर उसने कन्नम का सर खा लिया।

कन्नम की चाह की वजह से मेरी जिंदगी बरबाद हो चुकी थी। ना मेरा घर बचा ना मेरा परिवार। नाही मैं अब मेरे गाव ही वापिस जा सकता था। मैंने बहुत देर तक कन्नम के शरीर के पास बैठकर सोचा की आगे क्या करूँ लेकिन कुछ सुझ नहीं रहा था। मैंने कन्नम के घर यानी उस खंडहर की तलाशी ली कोई कीमती चीज तो नहीं मिली लेकिन एक मंत्रों की किताब मिल गई। जिसमें बहुत से टोटकों की जानकारी थी। मैंने वह किताब उठाई तो उसी जगह पर मुझे और एक कागज दिखा जिसपर हाथ से कुछ लिखा हुआ था। थोड़ा सा पढ़ने पर मुझे पता चला की वह अंजन बनाने की और इस्तेमाल करने की विधी है। मैंने वहाँ से एक थैला उठाया उसमें वह किताब और वह कागज डाल दिया और चल पड़ा अपनी किस्मत की परीक्षा लेने के लिये।

पास ही के पहाड़ पर मुझे एक गुफा मिल गई जहाँ पर कोई आता जात नहीं था। और कोई जंगली जानवर भी नहीं थे पास ही झरना बहता था तो पीने के पानी की कोई समस्या नहीं थी। वहाँ से थोड़ी ही दुर पर एक बस्ती थी जहाँ से मैं भिक्षा माँग कर लाता और दिन भर उन टोटकों को सिद्ध करने की कोशिश करता। मैंने सबसे आसान लगने वाले टोटके जिसमें कोई बली या किसी की हत्या की जरूरत ना हो चुने और वशीकरण, दूसरों की मन की बात जान लेना, आदि टोटके सिद्ध कर लिये। मैं अब अंजन तैय्यार करने के पीछे लग गया। उसके लिये बहुत सारी चीजो की आवश्यकता थी जिन चीजो का नाम तक मैंने कभी नहीं सुना था। लेकिन मैं कभी कभार बस्ती मे किसी से बात करता था तो वह लोग कई चीजो की जानकारी दे देते थे। और मुझे उसका और एक फायदा यह हुआ की वह लोग मुझे अब मांत्रिक कहने लगे थे। मैं भी कभी किसी का बच्चा बीमार हो जाये या किसी का जानवर, किसी की बेटी को बच्चा नहीं होता हो उसके लिये अपने पास से टोटके कर देता था। उनको जब उसके परिणाम अच्छे मिले तो वह मुझे और भी ज्यादा मान देने लगे। जैसे ही मेरे पास वह सब चीजे जमा हो गयी जिनकी अंजन बनाने के लिये जरूरत थी। मैंने रात दिन एक कर के अंजन बना ही दिया। अंजन बनाने की विधि लिखने वाले ने यह भी चेतावनी लिखी थी की यदि अंजन ठीक से नहीं बना तो वह आँख मे लगाने वाला हमेशा के लिये अंधा बन जायेगा।

मेरा मन दुविधा में पड़ गया की मैं क्या करूँ कैसे पता चले की मेरा बनाया हुआ अंजन सही तरह का बना हुआ है। वह तो आँख में लगाने से ही पता चल सकता था। मैंने आर या पार का निश्चय कर लिया और भगवान का नाम लेकर वह अंजन अपने आँखों में लगाया। पहले मेरे आँखों में इतना तेज दर्द हुआ की जैसे खौलता हुआ तेल मेरे आँखों में पड़ गया हो। मुझे लगा की मेरी आँखें चली गई मैं अंधा बन गया। मैंने जो अंजन बनाया था वह गलत बना था। ऐसे कई विचार मेरे मन में आ रहे थे मैं दर्द से चिल्ला रहा था। गुफा की दीवारों पर अपने सर को पटक रहा था। कुछ देर बाद जब थोड़ा सा दर्द कम हुआ और धुंधला नजर भी आने लगा तो लगा की मैं पुरी तरह से अंधा नहीं हुआ हूँ। लेकिन मेरी आँखों को कुछ भी नहीं हुआ था और अंजन भी सही सही बना था यह मुझे तुरंत पता चला जैसे ही मैंने अपनी आँखों को छुआ वह बिल्कुल बर्फ सी ठंडी महसूस हुई। अब समस्या यह थी की अंजन का प्रथम प्रयोग कहा किया जाये। मैंने दो दिन का समय जाने दिया जब मैं मेरे आँखों की ठंडक का आदि हो गया तो मैं तुरंत उस बस्ती में गया जहाँ भिक्षा के लिये जाता था। दो दिन आँखों के दर्द के कारण ना मैं भिक्षा के लिये गया था ना कुछ खाया था। जोरों से भूख लगी थी। मैं बस्ती में गया तो लोगों ने पुछा की दो दिन क्यों नहीं आये मैंने बताया की मेरी तबीयत ठीक नहीं थी। एक अधेड़ उम्र के आदमी ने मुझे उसके घर पर भोजन के लिये बुलाया। क्योंकि मुझे बस्ती में बहुत मान था तो मैं मना नहीं कर सका और दुसरा कारण यह भी था की अब मुझमें इतनी ताकत नहीं थी की यहाँ से भिक्षा लेकर वह गुफा में जाकत खाऊँ।

जब मै उस आदमी के घर पहुँचा जिसका नाम आत्माराम था। उसकी पत्नी ने भोजन परोसा , मैंने उसे भी अपने साथ बैठने के लिये कहा। हम दोनों ने भोजन किया और भोजन के बाद जब हम गप्पे लड़ाने के लिये बैठे तो मैंने अभी तक भूख की वजह से ध्यान नहीं दिया था की वह आदमी बहुत गरीब था। घर बहुत साधारण था और सामान तो न के बराबर था। मैंने उसे पुछा की क्या तुम्हारा गुजारा ठीक से नहीं चलता तो उसने बताया की उसे तबसे काम करने के लिये मन नहीं लगता जब से किसी बुजुर्ग ने यह बताया की उसके दादा जी ने बहुत सारा धन एक घड़े में बंद करके खेत में कही गाड़ दिया है। तो तब से वह दिन भर खेत का एक एक हिस्सा खोदता रहता है। इसलिये बाकी चीजो की तरफ ध्यान देने के लिये समय नहीं मिलता। उसकी बीवी ही किसी खेत पर रोजी के लिये जाती थी जिससे जैसे तैसे उनका गुजारा चल जाता था। जैसे ही मैंने खेत में धन की बात सुनी मुझे अंजन की परीक्षा लेने का मौका दिखा। मैंने उसे कहा की अगर मैं उसे उस धन का सही पता दूं तो क्या मुझे वह उसमें से आधा धन देगा तो उसने मेरी बात मान ली।

उसी रात मैं उसे लेकर उसके खेत मैं गया। जैसा की मैंने अंजन के उपयोग के बारे में पढ़ा था उसके लिये हिरन के सिंग चाहिये थे जो मेरे पास पहले से थे। मैं उसमें से खेत को देखने लगा। हिरन का सिंग आँख पर लगाते ही जमीन मानो जैसे काँच की बनी हुई हो ऐसी दिखने लगी। दूर एक आम के वृक्ष के नीचे मुझे कुछ चमकता दिखाई दिया मैं आत्माराम के साथ उस वृक्ष के पास गया तो मैंने फिर से हिरन का सिंग आँखों पर लगाया और उसके जड की तरफ देखने लगा। मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब मैंने स्पष्ट रूप से एक पीतला का घड़ा उसके अंदर के सोने सहित जमीन के अंदर कम से कम तीन हाथ नीचे देखा। मैंने आत्माराम को वहाँ खोदने के लिये कहा। क्योंकि वह दस-बारह सालों से सिर्फ खोदने का ही काम कर रहा था तो उसने कुछ ही देर में तीन हाथ गहरा गड्ढा खोद डाला। और घड़ा साफ तौर से दिखाई देने लगा। हम दोनों ने मिलकर वह उपर निकाला जो बहुत वजनदार था। उसमें बहुत सारे सोने के सिक्के थे। जैसा की तय हुआ था। उसने ईमानदारी से उसमें से आधे सिक्के मुझे दिये मैंने उसे एक कपड़े में बाँधकर अपनी गुफा की ओर चल पड़ा । और वह अपनी घर की ओर। दूसरे दिन पुरी बस्ती में यह बात फैल गई। मेरी गुफा के चारों ओर तो मानो मेला लग गया था। उस दिन से मेरी जिंदगी ही बदल गई। खजाना ढूँढने वाला मांत्रिक इसी नाम से मेरी प्रसिद्धि हो गई। अब मेरे पास ज्यादा तर ऐसे ही लोग आते जिनको अपने खेत या घर से गड़ा हुआ धन निकालना हो। पर हर जगह धन होता ही था ऐसा नहीं है। कई जगह सिर्फ अफवाहें होती थी। फिर भी मैंने कई लोगों के घर के खजाने ढूँढने मे मदद की और उसमें से आधा हिस्सा कमाया। लेकिन अब तक की मेरी सबसे ज्यादा कमाई सिर्फ ५०० सिक्कों की थी। मैंने जब तुम्हारे मुँह से तुम्हारे खानदानी खजाने के बारे सुना तो मुझे लगा की अगर यह खजाना ढूँढने में मैं तुम्हारी मदद कर सका तो मुझे जिंदगी भर कोई काम करने की जरूरत नहीं है। मैंने मेरी पुरी कहानी तुम्हें इसलिये बताई की जब मैं तुमसे आधे खजाने की माँग करूँ तो तुम मुझे लालची ना समझो।" मांत्रिक बाबु ने बोलना खत्म किया।

रावसाहेब ने कहा " यह सब सुनकर मेरा आपके प्रति विश्वास और भी बढ़ गया है। मैं आपसे वादा करता हूँ की जब खजाना मिलेगा तब उसमें से आधा खजाना मैं आपको दूंगा ।"

मांत्रिक बाबु ने फिर रावसाहेब से कहा की हर खजाने की खोज की शुरूवात उसके जगह के पता चलने पर ही होती है। और जैसा की रावसाहेब ने बताया था की उसके पुरखो ने उनका खजाना समुद्र में डुबो दिया है तो बाबु ने उससे पुछा की उसे यह बात कैसे पता चली। रावसाहेब ने एक बही के बारे में बताया जिसमें उसके परदादा ने खजाने के बारे में लिखा था।

बाबु को भी रावसाहेब ने वह बही दिखाई जिसमें लिखा हुआ था,

‘थे खजाने बहुत दुनिया में लेकिन 

यह खजाना खोजना नहीं है मुमकिन 

भर जाते कुएँ सात ऐसी वह राशी धन की 

देखकर वैभव सारा मिट जाती प्यास मन की 

क्या कारण था पता नहीं जो आया इसकी राह में 

पुश्तें कितनी चली गई इस धनराशी की चाह में 

कई वीरों ने प्राण त्यज दिये धनपर्वत के इस शोध में 

लेकिन डुबा दी गई अनंत धन राशी सागरतीर्थ की गोद में'

बाबु ने उस बही में लिखी यह पंक्तियाँ पढ़ी तो उसे भी कुछ समझ नहीं आया। हालाँकि रत्नागिरी के पास समुद्र तो था लेकिन बाबु को यह नहीं समझ आ रहा था की बिना किसी के जाने इतना सारा धन समुद्र में डुबाना मुमकिन नहीं है। किसी ने तो उसे देखना चाहिये था। क्योंकी अगर धन को सागर में डुबोने की बात सच है तो यह एक दिन मे नहीं हो सकता था अगर इतना सारा धन था।

बाबु ने भी बहुत सोचा मगर उसको इसका समाधान नहीं मिल पाया। उसने वह बही फिर से देखी तो उसे कई पन्नों पर कुछ उलटे अक्षर जो आसानी से नजर भी नहीं आते और पढ़े भी नहीं जाते थे दिखाई दिये। उसने उस कागज को उठाकर प्रकाश की ओर पकड़ा तो कुछ अक्षर नजर आये। उसने वह अक्षर कागज पर उतार दिये वह उलटे दिख रहे थे इसलिये आईने के सामने पकड़ लिये तो उसे एक नाम नजर आया "निळावंती" ।

मांत्रिक ने जल्दी से रावसाहेब को बुलाया और उसे उसके बारे में बताया जो उसे अभी पता चला था। निळावंती नाम सुनकर रावसाहेब भी चौक गया क्योंकि मांत्रिक बाबु और रावसाहेब भी महाराष्ट्र के बाकी के लोगों की तरह इस प्राचीन लोककथा के बारे मे जानते थे की निळावंती नाम का एक ग्रंथ है जिससे पशुपक्षीयों की भाषा समझी जा सकती है। लेकिन इसका संदर्भ इस खजाने से कैसे है यह समझ नहीं आ रहा था। रावसाहेब के हवेली पर एक नौकर काम करता था जिसका नाम था माणिक उसने उन दोनो की बाते सुनी वह भी अच्छी तरह से जानता था की उसका का मालिक वर्षों से खजाने की खोज में लगा हुआ था। तो शायद उनको अपनी जानकारी से मदद हो जाये यह सोच कर उसने रावसाहेब को कहा की वह निळावंती के बारे में कुछ जानता है।

रावसाहेब ने बताने को कहा तो उसने बताया की सुना है की निळावंती में समय में पीछे जाने का भी ज्ञान लिखा हुआ है शायद आपके पुरखे उसकी मदद से वह खजाना खोजना चाहते हो। रावसाहेब और मांत्रिक बाबु दोनों ही उस बात से सहमत हो गये क्योंकि निळावंती के बारे में जितनी भी किंवदंतीयाँ प्रचलित थी उसमें से यह भी एक थी।

रावसाहेब ने पुछा" लेकिन माणिक यह तो बताओ यह निळावंती अस्सल में है भी या नहीं। क्योंकि मैंने आजतक कइयों के मुँह से इसके बारे में सुना है लेकिन मुझे एक भी इंसान ऐसा नहीं मिला जिसने पढ़ने की बात तो दूर निळावंती देखी भी हो।"

“वह कहा है यह तो मैं नहीं जानता हा लेकिन उसे खोजने के लिये कहा जाना पड़ेगा यह बता सकता हूँ। क्योंकि मैंने जो भी सुना है उसके अनुसार महाबळेश्वर के जंगलों में बाजिंद रहता है उसे निळावंती के बारे में जरूर पता होगा क्योंकि वह भी जानवरों की भाषा बोलता है।" माणिक ने बताया।

“ठीक है तो फिर हम खुद ही बाजिंद को ढूँढेंगे और उससे निळावंती के बारे मे पता लागायेंगे। इतने सालो के बाद अब जाकर कोई सुराग मिला है खजाने के बारे में तो अब इसे ऐसे ही जाने नहीं दे सकते।" मांत्रिक ने भी सहमती दर्शायी।


रावसाहेब और बाबु दोनों ही महाबळेश्वर के जंगल के छोर पर खड़े थे। उन्होंने अंदर जाने से पहले किसी को पुछना ठीक समझा क्योंकि किसी जानकारी के बिना वे उस घने जंगल में महीनों भटके तो भी उनके हाथ कुछ लगने की आशा नहीं थी।

थोड़ी ही दूर एक गड़रिया भेड़ चराता हुआ दिखा। रावसाहेब और मांत्रिक बाबु दोनों उसके पास गये और उसे बाजिंद के बारे में पुछने लगे। की अगर उनको बाजिंद को ढूँढना हो तो कहाँ जाना चाहिये। पहले तो गड़रिये ने बताने से साफ मना कर दिया और कहा की वे दोनों अगर अपने जान की सलामती चाहते है तो वापिस लौट जायें। वे लोग पहले नहीं है जिन्होंने बाजिंद के बारे मे जानने की कोशिश की। कोई आज तक बाजिंद को ढूँढ नहीं पाया था। और उसका साफ मानना था की बाजिंँ बस एक कोरी कल्पना है और कुछ नही। लेकिन रावसाहेब और बाबु अपनी जिद़ पर अड़े रहे। उन्होंने कहा की बाजिंद कोरी कल्पना भी हो तो वह खुद अपने से उसकी जाँच करना चाहेंगे क्योंकि इतनी दूर आकर वह खाली हाथ लौटना नहीं चाहते थे। तो गड़रिये ने कहा कि वह उन्हें रास्ता दिखाने के लिये तैय्यार है।

उसने उन दोनों को वेताल की एक मूर्ति के पास लाकर छोड़ा जिसे बरसो से किसी ने नहीं पुजा था कहा की इसके पीछे से सीधे चलते हुये जाये जब तक ऐसी ही एक मुर्ति ना दिख जाये। और उन्हें छोड़कर वह चला गया।

रावसाहेब और बाबु दोनों ही वेताल की मूर्ति के पीछे से चल पड़े । जैसे जैसे अंदर जा रहे थे वैसे जंगल और ज्यादा घना हो रहा था। वे इतना अंदर पहुँच गये की दोपहर होने के बावजूद रात जैसा अंधेरा छा रहा था। सीधे चलना जितना कहा गया था उतना आसान नहीं था। क्योंकी रास्ते में पेड़ पौधे, बड़ी बड़ी शिलाये इतनी थी की कई बार रास्ता भटक जाते थे। उन्होंने मशाल जलायी जो साथ मे लाई थी। पता नहीं कितनी देर हुई लेकिन ना वेताल की मूर्ति दिखने का नाम ले रही थी, जंगल खत्म होने का। अचानक से उन्हें एक आकृति नजर आयी साफ नहीं दिखी लेकिन पता चल रहा था की वह एक मूर्ति है। दोनों ही मूर्ति के पास पहुँचे और सोचने लगे की अब आगे क्या? तभी मूर्ति जिसकी पीठ इनकी तरफ थी वह अपना सर इनकी तरफ घुमाने लगी। दोनों ही डर से काँपने लगे उन्हें समझ आया की क्यों बाजिंद की खोज में आया हर इंसान मरा हुआ पाया गया था। वह था डर लेकिन सिर्फ डर नहीं जिस जगह पर वे खड़े थे वहाँ की जगह धीरे धीरे सिकुड़ने लगी इतनी की लगता था वे दोनों उसमें पीस जायेंगे। चारों ओर से जगह इतनी संकरी हो गई की उन दोनों का दम घुटने लगा तभी उनके पैरो के नीचे एक सुरंग तैय्यार हो गई और वे दोनों उसमें गिर गये। वह सुरंग कही निकलने का गुप्त रास्ता था। बाबु और रावसाहेब दोनों ही उसपर से फिसलने लगे। कुछ देर बाद वे कही पर गिर गये। जंगल के मुकाबले वहाँ पर बहुत प्रकाश था। उन्होंने देखा वह कोई पुराना किला था। बाकी किलो की तरह यह उँचाई पर नहीं था बल्कि जमीन की सतह के काफी नीचे बना हुआ था। किले की हालत कुछ खास अच्छी नहीं थी। कुछ दिवारे, खंबे बचे हुए थे बाकी सब गिर गया था। गिरते समय बाबु और रावसाहेब का शरीर कई जगह से छिल गया था और कपड़े भी थोड़े से फट गये थे।

उन दोनों को यह पता नहीं चल पा रहा था की वे जंगल के कौन से हिस्से में है। दोनों ही वहाँ से बाहर निकलने का रास्ता खोजने लगे। क्योंकी वे जहाँ से गिरे थे उस सुरंग का छोर दस-बारह हाथ उँचाई पर था। चढ़ाई सीधी थी इसलिये वहाँ पर आसानी से पहुँचा नहीं जा सकता था। दूसरी बात यह थी की वे उस जगह वापिस जाना भी नहीं चाहते थे। जैसा की किला जमीन की सतह के नीचे उकेरा गया था तब भी बहुत विशाल परिसर में फैला हुआ था। जब इसे बनाया गया था तो मजदूर नीचे आते ही होंगे तो उपर चढ़ने के लिये कोई ना कोई रास्ता जरूर होना चाहिये था पर बहुत देर तक ढूँढने के बाद भी उपर जाने का जरीया मिल नहीं रहा था। परिसर में बहुत सी गुफायें भी थी लेकिन वह अंदर कितनी गहरी है इसका अंदाजा नहीं लग रहा था। इनके पास जो मशाल थी वह थोड़ी देर पहले की हड़बड़ी में कही गिर गई थी। समय निकलता जा रहा था। दिन का कौन सा समय है यह तो पता नहीं चल पा रहा था लेकिन वह कभी ना कभी तो ढलने वाला तो था ही। बाबु का कहना था की ऐसी जगह पर रात के समय रूकना ठिक नहीं होता, कई बार ऐसी जगहे शापित होती है। उसका यह भी कहना था हो ना हो जिन लोगों की जान गई है वे इसी जगह पर मारे गये हो। रावसाहेब को बाबु की बात जँच गई। अब तो उन्हें भी चिंता हो रही थी बात सिर्फ बाहर जाने की नहीं रह गई थी अब जान भी बचानी थी।

वहाँ पर २२ गुफाये थी मगर किसी भी गुफा में प्रकाश नहीं था जिससे अंदर जाकर रास्ते की खोज की जा सके। मांत्रिक को एक चकमक पत्थर दिखाई दिया तो उसने आग जलाकर मशाल बनाने की सोची। बहुत देर कोशिश करने के बाद आखिरकार आग जल गई थी पर दिन ढल चुका था। अंधेरा धीरे धीरे और घना हो रहा था। उनके पास ज्यादा समय नहीं था। पहली गुफा के अंदर मशाल लेकर दोनों दाखिल हो गये। लगता था की गुफा बहुत दूर तक फैली हुई थी क्योंकि मशाल का प्रकाश ज्यादा दूर तक पहुँच नहीं पा रहा था। वह जितना भी आगे जाते उतनी गुफा और दिखाई देने लगती थी।

दिन भर जंगल मे चलने के कारण पहले ही दोनों के पैरो ने जवाब दिया था। उपर से वह उस सुरंग से भी गिरे थे जिससे भी चोट पहुँची थी। पेट मे कौए हल्ला मचा रहे थे। और ऐसे मे यदि एक एक गुफा इतनी बड़ी हुई तो क्या कर सकते थे। मशाल आधी खत्म हो गई तभी बाबु ने कहा की हम और आगे नहीं जा सकते क्योंकि फिर वापिस जाने के लिये प्रकाश नहीं बचेगा। अगर इसी गुफा में फंसे रह गये तो दिन निकलने पर भी प्रकाश नहीं आयेगा और दिशा का पता न चलने के कारण गुफा के अंदर ही फँस जायेंगे। तो रावसाहेब का कहना था की पता नहीं हमारा यह निर्णय गलत निकल जाये तो, हो सकता है की बाहर जाने का रास्ता इसी गुफा में से निकले।

समस्या दोनों ओर से थी और वे दोनों ही दुविधा में पड़ गये। दोनों को एक दूसरे के मत सही लग रहे थे। निर्णय लेने के लिये वक्त नहीं था नहीं तो मशाल वही पर बुझ सकती थी। वे गुफा के बहुत अंदर तक आये थे। बाबु ने कहा की रावसाहेब की बात ठीक है लेकिन हम पहले बाहर जाते है और बहुत सारी मशालें बनाते है। और दूसरी गुफा से फिर से शुरूवात करेंगे यदि बाकी गुफाओ मे रास्ता नहीं मिला तो फिर से पहली गुफा में जायेंगे इससे हमारे बचने के मौके बढ़ जायेंगे। रावसाहेब ने बात मान ली। दोनों गुफा से बाहर आ गये। बाबु की बात बिल्कुल सही थी क्योंकी गुफा के दरवाजे तक पहुँचते ही मशाल बुझ गई थी। रात को क्योंकी तारे नजर आ रहे थे तो बाबु जो रात को खजाने निकालने के लिये जाते समय तारो से ही समय का अंदाजा लगाया करता था वह समझ गया की आधी रात बीत चुकी है। अब खतरा पहले से ज्यादा बढ़ चुका था। क्योंकी रात का यही वह समय था जिसमें सभी अनहोनी घटनायें हुआ करती है। साधनों की कमी की वजह से मशालें बनाने में बहुत समय लग रहा था वैसी परिस्थिति में भी बाबु ने पाँच मशाले बना ली थी। लेकिन उन्हें यकीन नहीं हो रहा था की इतनी मशालें एक गुफा के लिये भी काफी होंगी।

बाबु भी थक गया था उसका मन तो कह रहा था की रास्ता खोजना जरूरी है लेकिन तन साथ नहीं दे रहा था। उसे विश्राम की सख्त जरूरत थी। रावसाहेब की स्थिति भी इससे अलग नहीं थी। दोनों ने सुबह होने का इंतजार करने का फैसला किया और बाहर ठंड लग रही थी इसलिये उस गुफा के अंदर सोने चले गये जिसमें वे पहले जा चुके थे। वे ज्यादा अंदर नहीं गये थे। दोनों लेट गये भूख और थकान के मारे उनका बुरा हाल था। लेटते ही दोनों की आँख लग गई।

तभी रावसाहेब को कही से पायल की आवाज सुनाई दी। पहले उसने सोचा की यह उसका वहम होगा कभी कभी थकान की वजह से भी दिमाग भ्रम पैदा करने लग जाता है। फिर से वैसी ही आवाज अब की बार बाबु की भी आँखें खुल गई और वह उठकर बैठ गया। रावसाहेब को पहले से उठा देखकर बाबु जान गया की उस अकेले को वह आवाज नहीं सुनाई दी। फिर से पायल की आवाज आयी। इस बार ज्यादा तेज। दोनों को डर तो बहुत ज्यादा लग रहा था लेकिन उसका सामना करने के अलावा उन दोनों के बाद कोई रास्ता भी तो नहीं था। एक दूसरे का हाथ थामे हुए दोनों गुफा से बाहर निकले और देखने लगे की आवाज कहाँ से आ रही है। थोड़ी देर बाद फिर से आवाज आयी वह किसी गुफा से आ रही थी पर कौन सी यह पता नहीं चल रहा था।

बाबु ने मशाल जलायी और वे दोनो हर एक गुफा के मुँह पर जाकर सुनते की आवाज कहाँ से आ रही है। सभी गुफाओं के मुँह एक दूसरे से सटे हुए थे। वे जैसे ही तेरहवीं गुफा के पास पहुँचे आवाज ज्यादा ही तेज हो गयी। वे दबे पाँव गुफा के अंदर जाने लगे डर अब हद से ज्यादा बढ़ने लगा था। बाबु का पहले का डरपोक स्वभाव फिर से उभर गया और उसके पाँव थरथर काँपने लगे। वे गुफा के काफी अंदर चले गये थे लेकिन जितना वे आगे जाते थे आवाज उतनी ही अंदर से आती हुयी लगती थी।

तभी बहुत दूर कही एक टिमटिमाती रोशनी दिखी बिलकुल बाबु के हाथ की मशाल जैसी। वे धीरे धीरे उस ओर बढने लगे। वह रोशनी गुफा के अंदर बनी और एक गुफा से आ रही थी। वे उस छोटी गुफा के मुँहाने तक पहुँच गये और जैसे ही अंदर का दृश्य देखा तो दंग रह गये। एक किशोरवयीन लडका जिसके हाथ मे एक लाठी थी जिसमें घुँगरू बाँधे हुये थे। वह अपनी लाठी जमीन पर मार रहा था उससे पायल जैसी आवाज निकल रही थी। उसके आस पास जंगल के हर एक जानवर का एक एक प्रतिनिधि उपस्थित था। जैसे उन सब की सभा हो रही हो और वह लड़का उनका नेतृत्व कर रहा हो। वह लड़का प्रत्येक जानवर से बात कर रहा था। बाबु और रावसाहेब समझ गये की यह वही है जिसकी तलाश वे कर रहे थे "बाजिंद" ।


गुफा में शेर, भेड़िया, लोमड़ी, लकड़बग्घा, हिरन, मोर, साँप, बिच्छु आदि कई प्रकार के जंगली पशु थे। जंगल में जिनका आपस में बैर होता था वे जानवर भी एक दूसरे के पास बैठे हुये थे। बाबु और रावसाहेब हैरान हो गये। वे सोच रहे थे की अंदर कैसे जाये, कही किसी जानवर ने हमला कर दिया तो। वे गुफा के अंदर तो आ गये लेकिन आगे नहीं बढे। तभी उस लड़के की नजर उन पर पड़ी । उसने अपना सिर हिलाकर उनको पास आने के लिये कहा। बाबु और रावसाहेब दोनों भी उसके पास चले गये।

उस लड़के का चेहरा इतना आकर्षक था की ना बाबु ने नाही रावसाहेब ने इतना खूबसूरत इंसान अपनी पूरी जिंदगी मे देखा था। उसने सिर्फ एक धोती पहनी हुई थी। उसका बदन बेहद गठीला था। पुष्ट भुजायें थी लंबे बाल कंधे पर झुल रहे थे और मुसकान के तो क्या कहने। कोई इंसान ही क्या जानवर भी उस मुसकान का कायल हो जाता। उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी जो उन्होंने किसी के चेहरे पर नहीं देखी थी। संसार के सभी सुविधाओं से दूर सिर्फ इन जानवरों के बीच रहकर भी वह इतना खुश दिखता था जितना खुश संसार का सबसे अमीर इंसान भी ना हो।

लड़के ने उन से पुछा की वे यहाँ कैसे पहुँचे यह उसे मालूम है लेकिन उनके यहाँ आने का हेतु क्या है यह वह जानना चाहता था। उसने कहा की यदि वे निळावंती के बारे में जानने आये है तो मुश्किल है की वे यहाँ से जिंदा वापिस जाये। उन्हें मारा नहीं जायेगा लेकिन निळावंती का रहस्य ही यह था की उसे एक बैठक मे सुनना पड़ता था। लड़के का कहना था की वह एक बैठक में उसे सुना सकता था लेकिन सुननेवाले मे इतनी क्षमता ना होने के कारण वे अपनी जान से हाथ धो देते थे।

तब रावसाहेब ने कहा की उन्हें निळावंती के बारे में सिर्फ इतना जानना है की उनके किसी पुरखे ने लिखी किताब का उससे क्या संबंध है उनकी जानवरो की भाषा समझने में कोई रुचि नहीं है। और अपने खानदानी खजाने बाबु से मुलाकात और उस गुफा तक पहुँचने की पुरी कहानी बताई।

तब लडके ने कहा " मेरा कोई नाम नहीं है। मैने यहाँ आनेवाले लोगों के मुँह से ही सुना है की लोग मुझे बाजिंद के नाम से जानते है। लोग समझते है की मैं जानवरो की भाषा जानता हूँ यह निळावंती की वजह से है लेकिन मैंने उस ग्रंथ को पढ़कर जानवरों की भाषा नहीं सिखी। खुद रुद्रगणिका निळावंती ने मुझे यह भाषा सिखाई है।"

“क्या? निळावंती स्त्री थी। यह हमें नहीं पता था हमने सिर्फ इतना ही सुना है की निळावंती नाम का एक ग्रंथ है जिसे पढ़ने से जानवरों की भाषा समझती है।" रावसाहेब ने कहा।

"लेकिन आप निळावंती के बारे में क्यों जानना चाहते है जरा बताईयें।" बाजिंद ने कहा।

रावसाहेब ने अपनी जेब में रखा वह कागज निकाला जिसपर खजाने का उल्लेख किया गया था। और जिसपर निळावंती अक्षर उलटे लिखे गये थे। वह कविता पढ़ते ही बाजिंद मुस्कुराने लगा। बाबु और रावसाहेब दोनों उसके चेहरे की तरफ देखने लगे। बाजिंद ने कहा की इसका उत्तर तो बहुत ही आसान है।

बाजिंद ने कहानी शुरू की

"क्योंकी यह मेरे जन्म के पहले की बात है और मेरी उम्र अभी ११०० साल है तो यह घटना बहुत पुरानी है। आप इसे ध्यान से सुनिये क्योंकी इसी कहानी में आपके खजाने का रहस्य छुपा हुआ है।"

“पहले के लोग बहुत ही अक्लमंद थे। वे जानते थे की मनुष्य प्रकृति के साथ इतना नहीं एकरूप हो पात जितना पशु, पक्षी, पेड, पौधे होते है। इसिसे वे इस सृष्टी में अपना वजूद बनाये रखते है। वे प्रकृति के नियमों के बारे में हमसे बहुत ज्यादा जानते है। सोचिये हजारो पक्षी बिना किसी दिशादर्शक के एक जगह से दूसरी जगह जाते है। प्रत्येक वर्ष कैसे यह वे कर पाते है प्रकृति की अपनी भाषा है, जिससे वह हमसे संवाद करती है। मनुष्यों को भी वह भाषा समझती थी। लेकिन फिर जैसे जैसे मनुष्य यंत्रों का सहाय्य लेने लगा तो उसे प्रकृति के साथ संवाद करने की आवश्यकता कम लगने लगी। जिन लोगो को अब भी प्रकृति के रहस्य जानने थे उनके लिये उसका एकमात्र जरिया था। जानवर जिनसे बात करके वह उन रहस्यों को उजागर कर सकता था। तो हमेशा से ही वह जानवरो की भाषा सीखने की कोशिश में लगा हुआ था। हालाँकि कामयाब कोई विरला ही होता था, वह भी एखाद जानवर की भाषा में। परंतु इतना काफी नहीं था।

फिर किसी ने जाना की बच्चे का जन्म हो जाने के बाद यदि उसको पहली बार पिलाया जाने वाला पानी जंगल में रख कर जब सभी पशु, पक्षी, जानवर पी ले तो उसका एक घूँट बच्चे को उन सभी जानवरों की भाषा का ज्ञानी बनायेगा जिन्होंने वह पानी पिया है। जिसने यह बात खोजी थी वह मनुष्य था निळावंती का पिता।

जब निळावंती पैदा हुई थी उसके तीन दिन पहले उसके पिता ने जंगल मे एक बर्तन मे पानी भरकर रखा था। उन तीन दिनों मे जंगल के लगभग सभी जानवरों का मुँह उस पानी को लग गया था। निळावंती पैदा होने के तुरंत बाद उसको वह पानी पिलाया गया। उसका प्रभाव यह हुआ की वह चिड़िया , चींटी, कौए, कुत्ते आदि बहुत से जानवरो की भाषा समझने लगी। वह जानवरों की भाषा समझती थी तो उनको उन्हीं की भाषा में उत्तर देती थी। लेकिन जब गाव के लोगों ने यह सुना की छोटी सी लड़की के मुँह से इंसानी भाषा से पहले जानवरों की आवाजें निकल रही है तो उन्होंने उसके पिता से कहा की यह लड़की शापित है। इससे गाव पर कोई संकट आ सकता है तुम इसे जिंदा नहीं रख सकते। निळावंती के पिता ने गाववालो को समझाया की यह सिर्फ उसके किये हुए प्रयोग का नतीजा है पर किसी ने उसकी एक ना सुनी।

पंचायत बिठाई गयी और सभी ने एकमत से निर्णय किया की ऐसी लड़की जो जानवरों की आवाजें निकालती हो उसे जीने का कोई अधिकार नहीं है। हो सकता है उसके माध्यम से जंगली श्वापद, साँप, बिच्छु गाँव में घुसे और हमारे बच्चों और प्रियजनों को नुकसान पहुँचाये। उससे पहले ही यदि इस लड़की को मार दिया जाये तो उसकी नौबत ही नहीं आयेगी। निळावंती के पिता ने यह प्रयोग इसलिये किया था की उसे पशुओ की अद्भुत दुनिया को रहस्य समझने थे की कैसे भूकंप, उल्कापात, बाढ़ , बारिश का प्रमाण और समय इसका पता इन जानवरों को पहले ही चल पाता है। यदि इनसे यह बातें जान ली जाये तो हम भी मनुष्यों की कितने संकटों से रक्षा कर सकते है।

जब पंचायत के निर्णय का पता निळावंती के माता पिता को चला तो उनके पैरो तले जमीन ही खिसक गई। निळावंती की माँ ने कहा की हमें कैसे भी करके इस लड़की को बचाना चाहिये, जिन पशुओं की भाषा जानने की वजह से इसकी जान खतरे में पड़ गई है अब वे ही इसकी रक्षा करेंगे। सिर्फ बारह दिन की निळावंती को लेकर उसके माता-पिता जंगल की ओर भागे और उसे लेकर वही रहने लगे। निळावंती को भी जंगल बहुत पसंद आया और जंगल के श्वापदो को भी निळावंती भा गई। सभी जानवर जिनकी निळावंती भाषा बोलती थी वे निळावंती से बहुत प्यार करते थे। जिनकी भाषा नहीं आती थी उनकी भाषा निळावंती सहवास से सीख गई। दो साल की होने तक तो निळावंती जंगल के किसी भी जीव की भाषा बोल और समझ रही थी। और साथ ही अपने माता-पिता के साथ मनुष्यों की भाषा में भी बोल रही थी। उसके पिता का जो सपना था वह साकार हो चुका था। उन्हें ऐसे ऐसे रहस्य निळावंती के माध्यम से पता चल रहे थे जो कभी कानों से भी नहीं सुने थे।

निळावंती को कई बार जानवर या साँप कही दबे हुए खजाने के बारे बता देते थे तो निळावंती के पिता जाकर उस जगह से वह खजाना लाते और उससे कई गरीबों की गुप्त रूप से मदद करते थे। ऐसे ही सोलह साल निकल गये। अब निळावंती एक बहुत ही सुंदर किशोरी मे बदल गई थी।

एक बार की बात है जब ५-६ लुटेरे कही से निळावंती के पिता का पीछा करते हुए उस जंगल में पहुँच गये। निळावंती और उसके परिवार को जीने के लिये जो भी आवश्यक था वह उस जंगल से मिल जाता था। थोड़ा बहुत खर्चा सिर्फ कपड़ों पर ही होता था तो बहुत सा खजाना उसी गुफा में पड़ा हुआ था। लुटेरों ने जब वह देखा तो उनकी आँखे चौंधिया गई। बहुत सारा खजाना बिना किसी मेहनत के मिल गया यह उनके लिये बड़ी खुशी की बात थी। निळावंती के उपस्थित रहते कोई भी उस गुफा की तरफ नहीं आ सकता था क्योंकि जंगल के सभी जानवर उसकी रक्षा करते थे। और उनसे उसे कही की भी घटना का पता चल जाता था।

लुटेरों ने खजाना छीनने के लिये निळावंती के माता-पिता को मार डाला। हालाँकि यह घटना एक चील के माध्यम से निळावंती को तुरंत पता चल गई मगर उसे आने में थोड़ी देर हो गई। वह पहुँची तब तक लुटेरें जा चुके थे मगर ज्यादा दुर नहीं जा सके। निळावंती ने जानवरों को संदेश भेजा की कोई भी जिंदा जंगल से बाहर नहीं निकल पाये। लुटेरे जंगल से नहीं निकल पाये रास्ते में ही हाथियों के झुंड ने उन्हें कुचल डाला। पर इस घटना ने निळावंती को बहुत आहत किया। उसके हृदय को बड़ी चोट पहुँची उसके पिता बहुत ही साधु स्वभाव के इंसान थे उन्होंने कभी भी किसी का बुरा नहीं चाहा था।

अबतक तो जंगल के पशु ही निळावंती के सब कुछ थे। उन्हीं के लिये जीना और उन्ही के लिये मरना यही निळावंती के जीवन का उद्देश हो गया था। लेकिन उसके माता-पिता की हत्या के साथ उसको एक और उद्देश्य हो गया समाज के बुरे लोगों का नाश करना। इसके लिये जरूरी था की वह खुद भी मौत से बच सके। उसने जानवरों से पुछकर संजीवनी बुटी का पता लगाया जिसके खाने से मनुष्य मौत को टाल सकता था। जब उसने वह बुटी खाई तो वह भी मृत्यु के भय से रहित हो गयी। उसने अनेक ऐसे लोगों को मौत के घाट उतार दिया जिनसे समाज को खतरा था। और अपने पिता के जैसे बहुत से लोगों की मदद भी की। उसकी अमरता, जानवरों की भाषा समझने की उसकी अद्भुत शक्ति इससे उसकी गणना कुभाण्डो में होने लगी। कुभाण्ड वह लोग है जिनमें अद्भुत शक्तियाँ होती है। उन्हें भगवान शिव के गणों में भी गिना जाता है।

एक दिन की बात है एक तरूण व्यापारी जंगल के रास्ते से कही जा रहा था। वह बैलगाड़ी में अपना माल एक गाव से दुसरे गाव जाकर बेचता था। वह पहले कभी भी इस रास्ते से नहीं गया था इसलिये उसे यह नहीं पता था की इस जंगल मे किसी अपरिचित का आना प्रतिबंधित है। क्योंकि निळावंती के माता-पिता की हत्या के बाद से जंगल के पशु निळावंती की सुरक्षा की बहुत चिंता करते थे। वे किसी को भी जंगल मे घुसने नहीं देते थे। मगर वह व्यापारी तो अंदर आ गया था। भेड़ियों ने उसकी बैलगाड़ी का पीछा शुरु किया। भेड़ियों के झुंड को देखकर बैल डर गये और उन्होंने जोर से दौड़ना शुरू किया। बैलगाड़ी बुरी तरह से खिचने के कारण पत्थरों पर टकरा के टूट गई। व्यापारी नीचे गिरकर बेहोश हो गया। बैला जंगल के बाहर भाग गये।

निळावंती को उस व्यापारी के बारे मे पता चला तो वह उसके पास पहुँच गई। उसने देखा की एक खुबसूरत नौजवान बेहोश पड़ा है। उसके सर पर गहरी चोट आयी है। उसका अगर इलाज नहीं किया गया तो वह मर जायेगा। वह उसे अपने साथ अपनी गुफा मे लेकर गई। निळावंती को जड़ी बुटियों का ज्ञान था तो उसने उसका अच्छी तरह से इलाज किया। दो दिन बाद जब उस नौजवान को होश आया तो उसने देखा की एक अतिसुंदर लड़की उसका खयाल रख रही है। उसने निळावंती से बात की और अपना नाम अनिल बताया। निळावंती ने अनिल से कहा की उसका पुरी तरह से इलाज होने में कुछ और दिन लग सकते है। उन "कुछ" दिनों में अनिल को निळावंती से प्यार हो गया। कुछ ही दिनों में अनिल पुरी तरह से ठीक हो गया। उसने अपने मन की बात निळावंती को बता दी। निळावंती को भी अनिल अच्छा लगा था और वह उसकी इस हालत का खुद को जिम्मेदार मान रही थी। सहानुभूति भी प्यार होने की एक वजह होती है। इसी वजह से निळावंती को भी उससे प्यार हो गया था।

अनिल ने निळावंती से विवाह के लिये पुछा। निळावंती ने कहा की वह उससे विवाह करेगी लेकिन उसकी कुछ शर्तें है। अनिल ने शर्तें पुछी तो निळावंती ने बताया उसकी पहली शर्त यह है की वह रात में कभी भी उसके साथ नहीं सोयेगी। दूसरी शर्त यह है की वह अगर रात को कही जाये तो वह उसे नहीं ढूँढेगा। अनिल ने उसकी दोनों शर्तें मान ली। ५ साल वे बहुत खुशी खुशी साथ रहे।

एक दिन दोपहर को निळावंती और अनिल जंगल में भटक रहे थे तभी एक नेवला और नेवली कही जाते दिख गये। नेवली उदास लग रही थी। निळावंती ने पुछा की वह क्यों दुःखी है। नेवली ने बताया कि उसका पती अंधा है इसलिये वह उसको कभी अकेला नहीं छोड सकती। निळावंती के पास अंजन था। जो निळावंती ने उस नेवले की आँख मे लगाया। तुरंत नेवले को सबकुछ दिखायी देने लगा। नेवली ने निळावंती को दो दिव्य रत्न दिये कहा की यह दो रत्न बहुत शक्तीशाली है। इसमे से पहला जिसके पास होगा वह किसी के भी मन की बात जान सकता है। और दुसरा पास होने से वह किसी से भी हारेगा नहीं।

निळावंती का पति अनिल दूर से सब देख रहा था। जब उसने निळावंती से पुछा तो निळावंती ने भोलेपन से बता दिया मगर सिर्फ एक मणि के बारे में जिससे कभी हार नहीं होती थी। दूसरे मणि के बारे में उसने कुछ नहीं बताया। इसलिये नहीं की उसका अनिल के उपर विश्वास नहीं था बल्कि वह उस मणि की परीक्षा लेना चाहती थी।

अनिल की इच्छा हुई की सदा जीत दिलाने वाली वह मणि उसके पास हो। उसने निळावंती से वह मणि माँग ली निळावंती ने कहा की उसे उनकी क्या जरूरत है तो अनिल ने कुछ नहीं बताया। लेकिन उसने दूसरे मणि के प्रभाव से उसके मन की बात जान ली की अनिल उस जंगल के बाहर जाकर उस राज्य पर विजय प्राप्त करना चाहता था जिसमें वह जंगल था। वह मणि उसके पास होने से यह बहुत आसान हो जाता।

निळावंती को उसके विचार जानकर आश्चर्य हुआ लेकिन उसने अनिल को यह पता नहीं चलने दिया। एक रात जब निळावंती और अनिल जो शर्तों की वजह से अलग अलग सोते थे, सोये हुए थे तब अनिल को दूर से भेड़िये के चिल्लाने की आवाज आयी। वह निळावंती को बता रहा था की उसे अब भगवान शिव के गणों मे जाके रहना चाहिये। लेकिन शिवगणों में स्थान पाने के लिये जो चीज आवश्यक है वह एक प्रकार का तावीज था। जिसका पता भेड़िया उसे बताना चाहता था।

निळावंती ने भेड़िये का संदेश सुना तो तुरंत वह नदी की तरफ निकल पडी। निळावंती जाने के थोड़ी देर बाद अनिल भी उसके पीछे निकल पड़ा। निळावंती जान गई की अनिल उसका पीछा कर रहा है लेकिन उसने उसे मन नहीं किया।

नदी के किनारे पहुँचने पर भेड़िया निळावंती से मिला और उसने बताया की अभी थोड़ी देर बाद एक प्रेत नदी में बहता हुआ आयेगा उसकी कमर में वह तावीज बंधा हुआ है जिसकी मदद से वह भगवान शिव के गणों में शामिल हो सकती थी। निळावंती नदी के किनारे ही उस प्रेत का इंतजार करती हुयी बैठ गयी। आधी रात के समय नदी में एक प्रेत बहता हुआ आया। निळावंती उस प्रेत के पास गई और उसे खींचकर किनारे पर लेकर आयी।

अनिल पुरी घटना पेड़ के पीछे छुपकर देख रहा था। निळावंती की पीठ अनिल की तरफ थी तो उसे वह क्या कर रही है यह नहीं दिख रहा था। निळावंती ने प्रेत के कमर मे बंधा तावीज देखा वह बहुत ही विशेष दिख रहा था। और खुद से चमक रहा था। निळावंती तावीज खोलने लगी लेकिन वह इतनी मजबूती से बंधा था की छुटने का नाम नहीं ले रहा था। निळावंती ने आस पास देखा की काटने के लिये कोई चीज मिल जाये लेकिन पत्थर भी नहीं थे सिर्फ रेत ही थी। निळावंती दांत से रस्सी काटने के लिये प्रेत के उपर झुक गई। अनिल जो पीछे से घटना देख रहा था उसे लगा की निळावंती प्रेत खा रही है। वह बहुत डर गया और भाग कर गुफा में जाकर बैठ गया। जिससे निळावंती को कुछ पता ना चले। अनिल को नहीं पता था की निळावंती ने उसे उसके पीछे आते हुए देख लिया था।

बड़ी मुश्किल से वह तावीज निकालने के बाद निळावंती उसे लेकर अपनी गुफा में आ गई। अनिल वही पर बैठा हुआ था। उसने पुछा की वह कहाँ गई थी। निळावंती ने उसे विवाह के वक्त की शर्त याद दिलायी। लेकिन अनिल ने कहा की वह सब जानता है की वह मुर्दा खाने के लिये गई थी और उसे अब ऐसी औरत से कोई संबंध नहीं रखना है वह उसे छोड़कर जा रहा है। निळावंती ने उसे रोका नहीं पर समझाने की कोशिश की की वह मुर्दा नहीं खा रही थी पर अनिल कुछ सुनने की हालत में नहीं था। वह तुरंत वहाँ से चला गया।

निळावंती को भगवान शिव के गणो में शामिल होने के लिये आवश्यक तावीज तो मिल गया था लेकिन उसने सोचा की वह जाने से पहले आज तक उसने जितना ज्ञान इकट्ठा किया है उसकी विरासत ग्रंथ के रूप में पीछे छोड़ना चाहती थी।

उसने शुरूवात से सब कुछ लिखा चींटी की भाषा कैसे समझे, उसके संकेत क्या होते है आदि प्रकार से धीरे धीरे जंगल के सभी जानवरों के बारे में लिखा। उनकी भाषा लिखी। इसमें बहुत समय निकल गया। वह एक बहुत बड़ा ग्रंथ बन गया जिसका कोई नाम नहीं था। ना पढ़ने का कोई क्रम ही था। वह तो बस बहुत सी जानकारी का संकलन था। उसमें आत्माओं से संपर्क बनाने के तरीके भी लिखे थे।

अब उसे कोई शिष्य चाहिये था जिसे वह इस ग्रंथ को पढ़ने का तरीका और उसके रहस्य को बता सके। लेकिन इतने महत्त्वपूर्ण ज्ञान को वह इतनी आसानी से किसी को भी नहीं सौंप सकती थी।

वह हर दिन इसी तलाश में होती थी की कोई ऐसा उसे मिल जाये जिसे यह ज्ञान सीखना तो हो लेकिन वह इसका गलत इस्तेमाल ना करें। एक दिन जब वह जंगल में रोज की तरह घूम रही थी तब उसे मैं मिल गया। मुझे किसी कुँवारी माँ ने लोक लज्जा के डर से जंगल मे छोड़ दिया था। निळावंती ने मेरी माँ भी पाल नहीं सकती थी इतनी अच्छी तरह से पाला। मैं भी बड़े होते होते जानवरों की भाषा और वह सब ज्ञान जो निळावंती ने उस ग्रंथ मे लिखा था सीख गया हालाँकि इसके लिये मुझे ग्रंथ पढ़ने की आवश्यकता नहीं पड़ी ।

जब मैं सोलह साल का हो गया जैसा मैं अब हूँ तो निळावंती जिसे मैं माँ कहकर ही पुकारता था मुझे मेरे उससे मिलने की कहानी बताई और कहा की उसे अब उसकी असली जगह पर जाना होगा। उसने मुझे संजीवनी विद्या दे दी जिससे मैं दीर्घजीवी हो गया और मेरी आयु भी थम गई। पिछले हजार सालों से मैं सोलह वर्ष की अवस्था का ही हूँ । संजीवनी विद्या देने के बाद निळावंती ने किसी मंत्र का उच्चारण किया तो उसे लेने के लिये दूसरी शिवगणिकायें आयी। उनके साथ निळावंती हमेशा के लिये शिवगणो के साथ रहने चली गई। फिर मैं भटकते भटकते इस जंगल में आया और यहीं पर बस गया। तबसे मैं यही रहता हूँ और इस जंगल की रक्षा करता हूँ ।" बाजिंद ने कहानी पुरी की।

“लेकिन तुमने हमारे प्रश्न का उत्तर नहीं दिया।" बाबु ने कहा।

“हाँ! मैं बताना तो भूल गया की तुम्हारे किसी पुरखे ने जो कविता लिखी है उसमे जो सागरतीर्थ का नाम है वह समुद्र के लिये नहीं लिखा गया है। असल मे सागरतीर्थ उसी जगह का नाम है जहाँ निळावंती पैदा हुई थी। हजार सालों में उसका नाम जरूर बदला होगा। लेकिन मैं वह जगह जानता हूँ क्योंकी मेरी माँ ने भी मुझे उसी सागरतीर्थ के जंगल मे छोडा था।" बाजिंद ने बताया।

“आज वह जगह किस नाम से जानी जाती है?” रावसाहेब ने पुछा।

“आज वह जगह जानी जाती है रामलिंग के जंगल के नाम से।" बाजिंद ने जवाब दिया।

“मुझे वह जगह पता है। महाराष्ट्र के मराठवाडा प्रांत का बहुत ही प्रसिद्ध तीर्थस्थल है वह।" बाबु ने बताया।

बाजिंद ने फिर दोनों को अपनी आँखें बंद करने को कहा और पलक झपकते ही उसी वेताल की मूर्ति के पास छोड़ दिया जहाँ से बाबु और रावसाहेब ने जंगल में प्रवेश किया था।


बाबु और रावसाहेब ने आँखें खोली तो सामने वही वेताल की मूर्ति थी जिससे आगे जंगल मे रास्ता जाता था। उन्होंने अपने पीछे आवाज सूनी तो वही गड़रिया वहाँ पर भेड़ें चरा रहा था और उनसे कह रहा था। मेरी मानो तो यहाँ से वापिस चले जाओ। यहाँ से कोई जिंदा वापिस नहीं आया है।

उनको यकीन नहीं हुआ की इतना सब घट गया था लेकिन समय अब भी वही का वही था। तो यह सच था, निळावंती से समय पर काबु किया जा सकता है। लेकिन निळावंती कहाँ है यह तो किसी को भी नहीं पता। उसे सिर्फ किस्मत से ढूँढा जा सकता है। निळावंती उसि को मिलता है जो उसका इस्तेमाल नहीं करना चाहता।

अब रावसाहेब और बाबु को रामलिंग जाकर खजाना ढूँढना था। वे रामलिंग पहुँच गये लेकिन वहाँ जाकर उन्हें पता चला की सालो पहले किसी राजा को यहाँ का खजाना मिल गया उसी पैसो से यहाँ रामलिंग का मंदिर बना हुआ था। अब क्या किया जाये सब खत्म हो गया खजाने की खोज भी और निळावंती की तलाश भी। खजाने का इस्तेमाल हो चुका था। निळावंती भी बाजिंद के पास सुरक्षित थी।

यह थी उस आखरी इंसान की कहानी जिसने निळावंती की खोज की थी। लेकिन निळावंती आज भी रहस्य बनी हुई है। उसकी खोज करनेवाले आज भी उसको ढूँढते रहते है।

 आपको अगर निळावंती सुननी है तो आप को पता है की महाबळेश्वर के जंगल में वेताल के मूर्ति के पीछे से रास्ता मिल जायेगा लेकिन क्या आप वहाँ सच में जाना चाहते है।


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