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Saroj Verma

Horror


3.6  

Saroj Verma

Horror


वो ख़्वाब था या हक़ीक़त...

वो ख़्वाब था या हक़ीक़त...

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कभी कभी वो रात और वो मंज़र याद आता है तो मेरा दिल दहल उठता है आखिर वो क्या था?वो मह़ज मेरा कोई ख्वाब था या हक़ीक़त ,जिसे मैं आज तक भूल नहीं सका,जब कभी वो वाक्या मेरा सामने आता है तो ख़ौफ के मारे आज भी मेरे रौंगटे खड़े हो जाते हैं,उस रात की सारी घटना मेरी आंखों के सामने एक फिल्म की भांति चलने लगती है,भयानक और अंधेरी रात,ऊपर से सुनसान इलाका , बड़ा सा उजाड़ कमरा, फिर कंडक्टर की लाश का यूं मिलना,ना जाने उस रात क्या होने वाला था ?लेकिन हम उस रात सच में बच गए,अगर वो ना होता तो शायद हम सब भी उस कंडक्टर के साथ अपनी जान से हाथ धो बैठते.........

लगभग बीस साल पहले की बात है, मैंने अपने परिवार के साथ जयपुर घूमने का कार्यक्रम बनाया,बेटा बहुत दिनों से जिद़ कर रहा था कि पापा मुझे राजस्थान घूमने के लिए ले चलिए,सो मैं उसकी बात मानकर उसे जयपुर घूमाने को राज़ी हो गया।।

मैं,मेरी पत्नी रीमा और बेटा संयम घर से जयपुर के लिए रवाना हो गए,हमने दो दिन में पूरा जयपुर घूम लिया लेकिन मेरे पास अभी दो दिन की छुट्टी और भी बची थी तो मैंने सोचा क्यों ना अज़मेर शरीफ़ भी हो आते हैं, चूंकि हमारी ये प्लानिंग अचानक हुई थी तो हमें जल्दबाजी में बस का सहारा लेना पड़ा,उस बस में और भी यात्री थे, ख़ासकर बुजुर्गो की संख्या ज्यादा थी, हमारी जैसी केवल एक ही फैमिली थी,बस में यात्री भी कम ही थे, क्योंकि बस भी थोड़ी खजाड़ा थी इसलिए शायद उसमें ज्यादा यात्री नहीं बैठें होंगें।।

करीब रात के आठ बजे बस अपने गंतव्य की ओर रवाना हो चली,हम तीनों अपनी अपनी सीटों पर टेक लगाकर बैठ गए,संयम तो सो गया लेकिन मुझे और रीमा को बीच बीच में हल्की हल्की झपकी सी आ जाती,एक तो वीरान और अन्जानी जगह ऊपर से खजाड़ा बस में मुझे अनकम्फर्टेबल लग रहा था, ड्राइवर को भी शायद बहुत जल्दी थी गंतव्य तक पहुंचने की इसलिए वो भी बस को तेज़ रफ़्तार में भगाए चला जा रहा था,अंदर से डर भी लग रहा था कि कहीं वो बस को ठोक ना दें क्योंकि अंधेरा घना था,साथ में सुनसान सड़क के किनारे ,जिन पर ना कोई घर दिख रहा था और सड़क पर भी इक्का-दुक्का वाहन ही दिखाई दे रहे थे,कुछ बुजुर्गो ने ड्राइवर को टोका भी कि बस की रफ़्तार जरा धीमी करो,कुछ समय तक तो उसने बस को धीमी रफ़्तार में चलाया लेकिन फिर कुछ देर के बाद उसने फिर से बस की रफ़्तार बढ़ा दी।।

एक बुजुर्ग ने फिर से उस ड्राइवर को टोका कि बस की रफ़्तार कम करो लेकिन मना करने के बावजूद फिर से ड्राइवर ने रफ्तार बढ़ा दी,तब ड्राइवर ने जवाब दिया कि अंकल जी, जो मैं कर रहा हूं वो बिल्कुल ठीक कर रहा हूं, मैंने सुना है कि ये इलाका अच्छा नहीं है, बहुत ज्यादा खतरा है इस जगह और हम इस इलाके को जितनी जल्दी पार करके आगे बढ़ जाएं उतना अच्छा, ड्राइवर की बात सुनकर सबने कहा कि चलो ठीक है।।

बस तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ ही रही थी कि तभी एक तेज़ आवाज़ के साथ बस का थोड़ा संतुलन गड़बड़ाया और बस थोड़ी दूर बढ़ी और रूक गई,अब सब सकपका गए कि अचानक ये क्या हुआ? इतना खतरनाक इलाका और बस का रूकना किसी का भी जी डर जाएगा।।

ड्राइवर ने अपनी टार्च जलाई, बस के नीचे उतरा और उसने देखा कि क्या बात है?बस को आखिर क्या हुआ? वो रूकी क्यों? कुछ देर के मुआयने के बाद उसे पता चला कि बस के पीछे ओर के दोनों पहिए पंचर हो चुके हैं और बस में एक्स्ट्रा पहिए भी नहीं हैं जिससे उसकी मरम्मत हो सके।।

अब क्या किया जाए? सभी सोच में पड़ गए,रेतीली अन्जान जगह , अमावस की गहरी काली रात ,जंगली जानवरों का डर और बस का यूं खराब हो हो जाना,सबके तो जैसे होश ही उड़ गए थे,अब क्या करें? क्या ना करें? किसी के कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था।।

तभी कंडक्टर को थोड़ी दूर एक रोशनी दिखाई दी, उसने सबसे कहा कि देखो वहां रोशनी दिखाई दे दे रही है,हो सकता है कि वहां कोई गांव हो,चलो सब वहां चलते हैं,शायद रातभर के लिए कोई सुरक्षित जगह मिल जाए,अगर एक कोठरी भी मिल गई तो तब सब वहां एक साथ बैठकर रात तो गुजार ही सकते हैं,सब कंडक्टर की बातों से सहमत हो गए, सबने अपना अपना सामान उठाया और चल पड़े उस रोशनी की ओर, जैसे ही वो सब उस रोशनी के नज़दीक पहुंचे तो हमें एक एक बड़ी सी कोठरी दिखाई दी,जिसे देखने से लग रहा था कि वो कोई बहुत पुरानी सराय है जहां भूले भटके मुसाफ़िर रूकते होंगें।।

सब कोठरी के दरवाज़े के बाहर खड़े हो गए, ड्राइवर ने हिम्मत करके दरवाजे की सांकल खटखटाई,एक बहुत ही बूढ़े व्यक्ति ने दरवाज़ा खोला, उनके सिर पर एक बड़ी सी पगड़ी थी,गले में पुराने जमाने का कोई आभूषण था, कानों में भी कुंडल पहन रखें थे,कुर्ते की ऊपर उन्होंने ने एक सदरी पहन रखीथी,कमर में धोती , पैरों में पुराने जमाने की ऊंट के चमड़े की बनी मोजड़ी पहन रखी थी और हाथ में एक बड़ा सा लट्ठ ले रखा था।।

वो और उनका पहनावा बहुत ही अजीब लग रहा था, तभी कंडक्टर ने बड़ी हिम्मत करके कहा____

"ताऊ सा! बस पंचर हो गई है,हम सबको रात गुजारने के लिए अगर आपकी कोठरी में थोड़ी जगह मिल जाती तो बड़ी मेहरबानी होती।"

उस कोठरी के मालिक बोले___

"डरने की ज़रूरत कोई ना है,ये सराय तो मैंने भूले भटके मुसाफ़िरों की मदद करने के लिए बनाई है, मैं चौधरी सुमेर सिंह और म्हारी घरवाली धन्नो ही मुसाफ़िरों का ख्याल रखते हैं,आप सब लोग भीतर पधारों,जो हम दोनों से बन पड़ेगा तो आपकी मदद करेंगें।"

कंडक्टर बोला___"बहुत बहुत धन्यवाद ताऊ सा!बड़ी मेहरबानी,जो इस अन्जान जगह में आप हमारी मदद करने को राजी हो गए।"

चौधरी सुमेर सिंह बोले___

"इसमें धन्यवाद की के बात है,ये तो म्हारा फ़र्ज़ है,म्हारे को बहुत खुशी हुई जो आप लोंग म्हारे यहां पधारे,ये रहा पानी से भरा मटका,इस बड़ी सी डलिया में पूरियां रखीं हैं और उस बड़ी-सी बटलोही में आलू की तरकारी होगी,ये रहें पत्तल और आप सब अपना खाना परोस लीजिए, महिलाएं धन्नो के पास चलीं जाए और पुरुष मेरे साथ आ जाएं, जल्दी से सब खाना खा लो और जिसे बाहर का काम निपटाना हो वो निपटा आएं क्योंकि बारह बजे के बाद कोई भी बाहर नहीं निकलेगा और ना मैं किसी को बाहर निकलने दूंगा और कोई भी इसका कारण नहीं पूछेगा,सबके पास अपनी अपनी हाथघड़ी होगी,समय के अनुसार काम करके सोने के लिए लेट जाओ,ये रहें कम्बल सब बिछा लो।"

हम सबने चौधरी सुमेर सिंह की सारी हिदायतों के अनुसार काम किया और कम्बल बिछाकर लेट गए,जिनके पास अपने अपने शाॅल और चादर थे वे सब ओढ़कर लेट गए, चूंकि मेरे पास ओढ़ने वाला बड़ा कम्बल था इसलिए मैंने बेटे को अपने साथ सुला लिया और मेरी पत्नी औरतों के साथ अपना शाॅल ओढ़कर लेट गई।।

चौधरी जी ने एक बार फिर सबको बाहर ना जाने की हिदायत दी और सबको सोने के लिए कहा।।

लगभग बाहर बजे के बाद ना जाने कंडक्टर को क्या सूझी,उसे बीड़ी पीने की तलब लगी और वो बाहर जाने लगा, चौधरी जी ने उसे बहुत रोका लेकिन  वो नहीं रूका, कंडक्टर के बाहर जाने के बाद चौधरी जी ने जल्दी से कोठरी के किवाड़ बंद किए और साथ में पटरे की मदद से किवाड़ को मजबूती से बंद कर दिया कि कोई भी भीतर ना आ सकें और सारे रोशनदान और खिड़कियों को भी बंद कर दिया।।

कुछ देर के बाद बाहर से बहुत बहुत बुरी बुरी और डरावनी आवाजें आने लगी,साथ में कंडक्टर की भी आवाज सुनाई दी,वो चिल्लाकर चिल्लाकर बचाओ बचाओ चिल्ला रहा था, कोठरी के कुछ लोग कंडक्टर की मदद के लिए बाहर जाने लगें लेकिन चौधरी जी ने उन्हें सब ये कह कहकर रोक दिया कि अगर सब बाहर गए तो सर्वनाश हो जाएगा,वो शैतान अगर भीतर आ गया तो हम में से कोई भी जिन्दा नहीं बचेगा,सब अपनी जान के विषय में सोचकर पीछे हट गए, फिर चौधरी जी ने सबसे कहा कि सब अपनी अपनी जगह पर लेट जाएं और उनकी बात मानना हम सबकी मजबूरी थी,हमने सबने वही किया जो चौधरी जी ने कहा था,एकाध घंटे बाद सबको नींद आ गई।।

हम सब सुबह जगे तो वहां का मंजर देखकर दंग रह गए,हम सब रेत पर लेटे थे और वहां से कोठरी गायब थी,केवल हम लोगों का सामान ही पड़ा था, वहां दो समाधियां बनीं थीं जिन पर चौधरी सुमेर सिंह और धन्नो सिंह लिखा था,हम सब ये देखकर हैरान थे कि आखिर रात को जो हुआ था वो ख़्वाब था या हकीकत।।

तभी वहां से एक चरवाहा अपनी भेड़ों के साथ निकला, उसको हम लोगों ने सारी बात बताई तो उसने बताया कि यहां बहुत समय पहले एक सराय हुआ करती थी जिसकी रखवाली चौधरी सुमेर सिंह और उनकी पत्नी धन्नो किया करते थे और उन दोनों के स्वर्गवास के बाद आज भी उनकी आत्माएं भटके हुए मुसाफ़िर की मदद करने आतीं हैं,इस इलाक़े में बहुत शैतानी आत्माएं रहतीं हैं जो लोगों को कत्ल कर देतीं हैं लेकिन सुमेर सिंह और उनकी पत्नी अच्छी आत्माएं हैं इसलिए वो लोगों की मदद करने आ जाते हैं,ये सब कहकर चरवाहा वहां से चला गया लेकिन हम सबके मुंह और आंखें खुली की खुली रह गई,

फिर हम सबने अपना अपना सामान उठाया और बस की ओर आए,देखा तो वहां कंडक्टर की लाश लहुलुहान पड़ी थी,वो सब देखकर हम सबका दिल दहल गया,थोड़ी देर के इंतजार के बाद वहां से एक दूसरी बस गुजरी और हम सब उसमें बैठकर अपने गंतव्य को रवाना हो गए।।


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