तुझ में ही विलुप्त
तुझ में ही विलुप्त
ईश, मेरे कहाँ विलुप्त हो गए ?
इतना दिया दर्द कि
दर्द भी रो पड़े।
नदिया से बहे नीर
पर तुम मेरी टीस
से अनभिज्ञ रहे।
ईश, मेरे कहाँ विलुप्त हो गए ?
इतने सहे अपशब्द कि
शब्द भी शर्मसार हो गए।
सागर से बहे अश्रु
पर तुम मूक से
मूर्त बन खड़े रहे।
ईश, मेरे कहाँ विलुप्त हो गए ?
इतने झेले अपमान कि
अपमान भी उपेक्षित हो गए।
सैलाब से बहे आँसू
पर तुम स्तंभ से
बस निहारते रहे।
ईश, मेरे कहाँ विलुप्त हो गए?
इतने लगाए लांछन कि
लांछन भी क्षतिग्रस हो गए।
निर्झर से बहे दृग
पर तुम आसनस्थ
एक टक देखते ही रहे।
ईश, मेरे कहाँ विलुप्त हो गए ?
इतने मिले जख्म कि
घर से बेघर हो गए।
भूल गए राह सब अश्क
और तुम मूर्ति में
स्थापित ही रहे।
ईश , तुम कहाँ विलुप्त हो गए?
इतने हुए बेघर कि
तेरे संग भटक रहे।
पर फिर तुम अपने
घर की राह दिखा गए।
ईश मुझे "अहम् ब्रह्मास्मि "
का मूल मंत्र दे गए।
मैं तुझ में ही विलुप्त कह गए।
