तन्हाइयों का दफ़न
तन्हाइयों का दफ़न
कितना परेशान हूं मैं तन्हाइयों से,
वो मेरा पीछा छोड़ती ही नहीं,
कैसे दूर करूँ मैं इन तन्हाइयों को,
रास्ता मुझे कहीं भी मिलता नहीं।
बावरा बनकर भटक रहा हूं मैं,
तन्हाईयांँ लेने को कोई तैयार नहीं,
तन्हाई से भरा मेरा चेहरा देखकर,
कोई मेरे साथ चलता ही नहीं।
जब तक मैं जिंदा रहूंगा दुनिया में,
सुकून मुझे कभी मिलेगा नहीं,
तन्हाईयों को मैं मिटाना चाहता हूं,
खुदा की कयामत भी होती नहीं।
चाहता हूं कि तन्हाइयों को दफना दूं,
कब्रिस्तान में जगह मिलती ही नहीं,
जितनी भी कब्र है कब्रिस्तान में "मुरली",
कोई भी कब्र तनहाइयों से मुक्त नहीं।
