उलझन
उलझन
उलझती हुई जिंदगी से मै परेशान हो रहा हूंँ,
मन से मायूस बनकर भी उसे सुलझा रहा हूंँ।
राह पर मुसीबतें है फिर भी होंसला भरकर,
मंज़िल को पाने के लिए मै आगे बढ रहा हूंँ।
दिल से तन्हाँ हो कर, मन से मायूस बनकर,
सुकून पाने के लिए मै कोशिश करता रहा हूंँ।
उलझनों को भुलकर, आंखो से अश्रु बहाकर,
मुकम्मल जहां पाने के लिये मै धुमता रहा हूंँ।
चेहरा निस्तेज है फिर भी मन में उम्मीदें भरकर,
मेरे बेकरार दिल को मै प्यार से समझा रहा हूंँ।
अब तो दिल कहता है आसमान में उंचे उडकर,
जीवन में खुशीयों के तरानें मै गाना चाहता हूंँ।
कब चलता रहेगा? जिंदगी में उलझनों का सफर,
"मुरली" रब की कयामत का इंतजार कर रहा हूंँ।
रचना:-धनज़ीभाई गढीया"मुरली" (ज़ुनागढ-गुजरात)
