संध्यावंदन
संध्यावंदन
सुहानी ढलती शाम को मन से करुं मै वंदन,
आसमान के रंगीन नज़ारे ने कीया है वंदन।
अस्त सूरज की लाली में महसूस हुआ स्पंदन,
बहती हवाओं की लहरों ने भी किया है वंदन।
घर लौट रहे पंछीओं के तराने में मधुर कंपन,
मंदिर के सुरीले घंटारव ने भी किया है वंदन।
जलते हुए दीपक की ज्योत में है शांत चिंतन,
भक्तिरस में डुबकर खुद को किया है वंदन।
तन्हाई भरे जीवन में प्रभु दर्शन की उठी लगन ,
बहती साँसों की सरगम ने भी कर दिया वंदन।
मिटती हुई रौशनी में है जीवन का गहरा सुकून,
नई आशाओं की किरनों ने भी किया है वंदन।
जीवन की चुनौतियों से शांत हुआ है मेरा मन,
"मुरली" ने ये मस्त समा में किया है संध्यावंदन।
रचना:-धनज़ीभाई गढीया"मुरली" (ज़ुनागढ-गुजरात)
