नज़र
नज़र
नज़र में सपनों की महफिल सजाकर बैठा हूंँ,
जीवन की हकीकत को रंगीन बनाकर बैठा हूंँ।
जहां नज़र करता हूंँ वहां नया दिखता है मुझे,
यही नज़र से जिंदगी का रास्ता ढुंढकर बैठा हूंँ।
नज़र में प्रेम ज्योत प्रज्वलित दिखती है मुझे,
जिंदगी में जुदाई की तन्हाईयांँ भूल बैठा हूंँ।
नज़र से मिली हई सच्चाई दिख रही है मुझे,
इसलिये मेरी नज़र में आनंद को समा बैठा हूंँ।
नज़र मेरी आंखो की बहुत निर्मल है "मुरली",
इसलिये सब के दिल में जगह पा कर बैठा हूंँ।
रचना:-धनज़ीभाई गढीया"मुरली" (ज़ुनागढ)

