प्रेम का त्याग
प्रेम का त्याग
प्रेम में मैने जो पाया, वो मैने अर्पण कर दिया,
मेरे दिल में रही तमन्नाओं का त्याग कर दिया।
तेरा इंतज़ार कर के हरपल बेबस हो गया मै,
प्रेम का फ़र्ज़ तेरे लिये मैने कुर्बान कर दिया।
तेरे प्रेम की ज्वाला में जलकर निखर गया मै,
तेरे विरह के राग का मैने आलाप कर लिया।
तेरे प्रेम के लिये सब कुछ छोडकर बैठा हूं मै,
मेरी जिंदगी की वसियत तेरे नाम कर दिया।
तू मुझे मिल गई तो मेरे हर ख्वाब पूरे हो गये,
वरना अधूरी पलों का मैने उम्मीद छोड दिया।
तेरे प्रेम को पा कर खुद गहराई में डुब गया मै,
फिर भी प्रेम में खोकर मैने खुद को पा लिया।
तेरे प्रेम के लियै सब कुछ लुंटाकर बैठा हूंँ मै,
फिर भी बेवफाई कर के तुने साथ छोड दिया।
तेरे चले जाने के बाद तड़पता रह गया हूंँ मै,
"मुरली" प्रेम त्याग कर के मै फकीर बन गया।
रचना:-धनज़ीभाई गढीया"मुरली" (ज़ुनागढ-गुजरात)

