तकलीफ की इंतेहा के उस रोज़....
तकलीफ की इंतेहा के उस रोज़....
जब-तलक घुटता रहेगा इन ग़मों से आज़ाद-गिरेबान का दम
तब तक पीएंगे हम
कुचलकर -मसलकर इन दुखद मसलों की बुनियाद हिलाकर आज
आज बम के अंदर गम का बारूद भरकर ,
इसे चिंगारी दिखाकर धम्मं से उड़ा देंगे
मार गोली इस दर्द के
खाली बंदूक की नम नली से
'खाली-खाली सा'
ये दिल से लिपटा गम मिटा दे
मलमल की गुदड़ी में सिमटे
ये मखमली सपनों की मटमैली सोच को खरोंच कर
खुरच -खुरच कर भेजे की खाली पड़ी खोली के
सिरे पर लटकी
जंग लगी किवाड़ों पर से
कुण्डी सरका के
खोपड़ी की झोंपड़ी में
मति का स्वादानुसार तड़का लगा के
अक्ल की शक्ल का चिकना थोबड़ा
बरसों से सूखी पड़ी रेगिस्तान की गरम रेत में
मृगतृष्णा की नरम -नाज़ुक सी मिथ्या छाँव में लटके
गीले मटके की बनी झाड़ू से कटका कर ,
ज़रा सा फटकाकर ,
अटके खटके को झुके कंधों से
एक बार फिर झटककर
इस बारी तगड़ा सा झटका देकर
हक्का बक्का सा उसे भड़काकर
हड़काकर उसे वहीं छोड़कर
भेजा ये ऊपर का फिर से
खड़का कर, फिर से इसे खनकाकर
भर दो एक अरसे से खामोश पड़ी
ज़िन्दगी में तहलका गुर्राकर ।
