शृंगार रस
शृंगार रस
तुम्हारी आँखों में झांकते ही जिज्ञासा जन्म ले रही है,
एक सफ़र काट लूँ उम्र का तुम्हारी आगोश में ये कह रही है...
एहसास चल पड़े है मेरे दिल की अंजुमन से निकलते तुम्हारी हथेलियों से मिलने,
इश्क की चद्दर ओढ़ लूँ मन में संदली हवाएं बह रही है...
तुम्हारे स्पर्श की परिभाषा समझते मेरे अंगों में रागिनी बज रही है,
छूकर देखो न सीने में उठते उफान में खलबली बढ़ रही है...
कहो तो अपना वजूद तुम्हारी चाहत को समर्पित कर दूँ,
कैसे ठहरूँ, तुम्हारी आँखों में प्रीत अंगड़ाई ले रही है...
मद्धम बहती रात के शामियाने तले आओ मिल ले गले,
गरदन पर ठहरे तिल ने तुम्हें पाने की तलब जगा रखी है...
टपकती है शहद सी शबनम तुम्हारे होंठों की परतों से
मेरे लबों की तपिश उस आग को पीने मचल रही है...
जो तुम मेरी साँसो की रफ्तार पर नृत्य करते मेरे सीने पर सर रख लो,
मैं अपने लबों से उठती चिंगारियों को मुखर कर दूँ मेरी तमन्ना कह रही है..

