साँस साँस आज़ादी.....
साँस साँस आज़ादी.....
देश की नाव न डोले, लहरें कितनी भी तूफानी हों,
रात का चाँद या, दिन का सूरज, एक सी कहानी हो।
कइयों की आहुति और, कइयों का है ख्वाब ये धरती,
जन-जन की धड़कन बलिदानी, और साँस-साँस आज़ादी हो।
देश की नाव न डोले, लहरें कितनी भी तूफानी हों…..
कर्म, धर्म से होता रहे, पर धर्म न कर्म पर हावी हो,
कोई पलक न भूखी झपकें, सबकी नींदें हरियाली हों।
पीठ ज़मीन पर, सटाने न पाए, दुश्मन हमारे इरादों का,
हर दिल में हो हौसले, हर हौसला खुद में कहानी हो।
जन-जन की धड़कन बलिदानी, और साँस-साँस आज़ादी हो…..
विष्णु, महेश से होता हुआ, देश राम, कृष्ण तक आया था,
प्रताप और पृथ्वीराज ने, शौर्य से इसे सूर्य सा चमकाया था।
कइयों ने इसे लूटा-रौंदा, कइयों ने गुलामों सा रुसवा किया,
मगर देश मेरा अडिग रहा, जैसे कोई अनमिट कहानी हो।
देश की नाव न डोले, लहरें कितनी भी तूफानी हों…..
सुभाष, भगत मर-मिटे, आज़ाद, मंगल कुर्बान गए,
खुदीराम, बिस्मिल पीस गए, गाँधी-नेहरू तब जीते थे।
आज़ादी तो पाई हमने पर, मन तो जख़्मों से सींचा था।
अब वो ज़ख्म ही जज़्बा हैं, हर ज़ख्म की अमर कहानी हो।
जन-जन की धड़कन बलिदानी, और साँस-साँस आज़ादी हो…..
