STORYMIRROR

Pankaj Prabhat

Children Stories Drama Children

4  

Pankaj Prabhat

Children Stories Drama Children

बचपन

बचपन

1 min
30

बचपन की यादों में, ये मन, सोया सा लगता है,

घर के आँगन का, वो आसमान, खोया सा लगता है,


वो सोंधी सी मिट्टी, जिसे छुप कर, खाया करते थे,

उस मिट्टी का स्वाद, अभी भी, ताज़ा सा लगता है


दूध रोटी खाते वक़्त, जब कटोरे में, चँदा होता था,

वो सुंदर सा मेरा चँदा, अब, अधूरा सा लगता है।


वो स्कूटर का दो चक्कर, जो, वर्ल्ड टूर सा होता था,

वो वर्ल्ड टूर, अब तक, सच्चा सा लगता है।


उंगली पकड़ कर मेले में, जब, घूमा करते थे,

वो गुब्बारे के लिए रूठना, अब भी, हक़ जैसा लगता है।



जाने कब क्यों कैसे, पंकज प्रभात हो गए,

पर मन तो अभी भी वही, हेमू जैसा लगता है।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन