"मां कभी निकालो वक़्त अपने लिए भी"
"मां कभी निकालो वक़्त अपने लिए भी"
माँ कभी अपने लिये भी वक़्त निकालो
उठो आराम से सुबह,
बिना किसी अफ़रा तफ़री के
निकल जाओ एक लम्बे सफ़र पे
बिना किसी साथ और सहयोग के
संग ले जाओ अपने सपने
और लगाओ उन में उत्साह के पंख
अपनी भूली बिछरी आशाओं और इच्छाओं को
जो अब तक दब के रह गई
घर की जिम्मेदारियों में
बच्चों के पालन पोषण
और पति की इच्छाओं को पूरी करने में
उन सब इच्छाओं और आशाओं को समेट कर
फिर से एक बार अपने आप को जीवित करो
और हर एक पल का आनंद लेती हुई
आगे बढ़ती चली जाओ
अपने लिए अपने सपनों और अपनी इच्छाओं के लिए
मुक्त हो जाओ हर जिम्मेदारी से
अपने सारे सपने लेकर,
सुनो माँ....
जो कभी-कभी खिन्न हो उठती होगी
साड़ी लपेटते- लपेटते
तो पहनो अपनी मनपसंद वेस्टर्न ड्रेस
और कर लो आज अपनी हसरत पूरी
पहन कर आगे बढ़ो माँ
ना पी जो कभी अकेले बैठ कर
किसी कैफ़े में कॉफी या चाय....
तो जाओ माँ चेयर खींच के बैठ जाओ
सुकूँ के कुछ पल अपने नाम कर लो
एक एक सिप के साथ
अपनी धड़कन की उस बेचैनी को शांत करो
जो तुम्हारे हर सपने को तुमसे दूर करती चली गई
माँ भूल जाओ सब
तमाम दर्द तमाम चिंताएं
सिर्फ़ अपने लिए जीयो कुछ पल अपने लिए
सिर्फ़ अपने लिए...माँ,
फिर से एक बार नादानियां करो
छोड़ दो सारी समझदारी
बन जाओ वही सोलह साल की अल्हड़ लड़की
और जो आधी अधूरी तमन्ना रह गई थी
उनको खुले आसमान में दुपट्टा बना कर
लहरा दो मां....
जाओ माँ जियो अपने लिए सिर्फ़ अपने लिए...!!
