STORYMIRROR

aazam nayyar

Abstract Fantasy

4  

aazam nayyar

Abstract Fantasy

गुलाब

गुलाब

1 min
454

खिलकर चेहरा गुलाब रहता है

ऐसा सजकर जनाब रहता है


प्यार इजहार कर दिया उससे 

कब लबों पे ज़वाब रहता है


कॉल कैसे करूँ उसे मैं तो 

फोन उसका ख़राब रहता है


कैसे दीदार उस हंसी का हो 

उस चेहरे पे नकाब रहता है


होश में कब रहता वही अपने

पीता वो ही शराब रहता है


मारने को तैयार है पत्थर

हाथ में कब गुलाब रहता है


प्यार का ख़त लिखता नहीं मुझको 

पढ़ता ही वो किताब रहता है


ग़म मिला है आज़म को अपनों से 

रोज़ आँखों में आब रहता है



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract