STORYMIRROR

Madhu Gupta "अपराजिता"

Tragedy Fantasy

4  

Madhu Gupta "अपराजिता"

Tragedy Fantasy

"लिपट कर रोना है मुझको"

"लिपट कर रोना है मुझको"

1 min
14

फिर से मां के आंचल से लिपट कर सोना है मुझको। 

 बहुत थक गई हूं अब जी भर कर रोना है मुझको।। 


ख़ुद के अफसानों से निकाल कर सारा हाल सुनाना है मुझको। 

जी उठूँ लिपटकर उससे अब यह सच दिखलाना है मुझको।।


साँसे कब से सिसक रही हैं यह भी तो बतलाना है मुझको

मां तेरे आंगन में फ़िर झूम के नाचूँ ख़ुशी ये भी दिखलानी है मुझको।।


समझ सके सब मेरी बाते यह हुनर पूछना है मुझको। 

उलझा कर अपनी बातों में सारे राज बतलाना है मुझको।।


कैसे निभाती हो सारे रिश्ते यह भी सीखना है मुझको। 

मां अब और कहीं नहीं जाना बस तुझ में खोना है मुझको।।



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy