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Manisha Kumar

Drama Tragedy

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Manisha Kumar

Drama Tragedy

लेखक की व्यथा

लेखक की व्यथा

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न हूँ कवि, न कोई चितेरा

मैं एक सादा सा इंसान

जो कुछ भी मन में आता है

कर देता अक्षर के नाम


तुम कहते हो जिसे कविता

दिल की मेरे सच्चाई है

उतर कर आई जो कागज पर

हृदय की यह गहराई है


जब भी चाहूं चैन से सोना

अक्षर बरबस आ जाते हैं

उमड़-उमड़ कर घुमड़ -घुमड़ कर

जगा ही मुझको जाते हैं


जब भी चाहूं मैं कुछ कहना

ये शब्द कहीं गुम जाते हैं

बैठ जाऊं जब थक हार कर

आ आकर मुझे चिढ़ाते हैं


जब जब इनको पकड़ना चाहो

छिटक दूर हो जाते हैं

करना चाहो दूर जो खुद से

आसपास मंडराते हैं


कोई तो बतलाए मुझको

कैसे इनसे ताल बैठाऊं

बन जायें ये मेरे साथी

जैसे चाहूं इन्हें सजाऊं



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