STORYMIRROR

Renu Sahu

Tragedy

4  

Renu Sahu

Tragedy

जनक... हर युग मे,

जनक... हर युग मे,

1 min
121

क्यूँ हर युग मे जनक ही रोए 

सूता का पालक क्यू सूता को खोए

कभी हिमालय कभी जनक जी, 

कभी द्रुपद के नैन है सूखे

पाले जिसे प्रेम हाथ से

वो क्यू वन वन दुख मे भटके


गाओ गान महादेव की

करो पूजा मर्यादापुरुषोत्तम की

या पाण्डव की विजय पताका लहराओ

या सुनाओ दोहे सबको गीता की


पर कोई तो पिता का दर्द दिखाए

उस अथाह हृदय की व्यथा बताए

हा गर्व करते है ये पुत्रियों पे

पर कोई एक तो सुख के आंसू की वजह बताए


कहो ना कहो कि चुप ही रहो 

आज भी जनक ही रोता है 

दशरथ की पुत्र भक्ति सब गाते 

मिथिला का त्याग ये जग भूलता है 


कर्तव्य सुख की कहासुनी है 

या भावनाओ की सरिता 

जब दिखे जनक भी मुस्काता 

तब शायद सार्थक होगी मेरी कविता।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy