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Rajeev Rawat

Tragedy Inspirational

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Rajeev Rawat

Tragedy Inspirational

जिंदगी - - दो शब्द

जिंदगी - - दो शब्द

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सांझ की बेला में

चुपके चुपके अपने आंचल से आंखें पोंछकर

दरवाजे पर खड़ी राह निहारती

अपनी पत्नी के

कांधे पर रखते हुए कंपकंपाता हाथ

बुजुर्ग बोले--

तुम रोज सुबह - दोपहर और रात को

किसका करती हो इंतजार

यूं दरवाजा खोले--

उड़ने वाले पंछी

आकाश की ऊँचाइयों को छूने की चाहत में

उड़ कर वापिस नहीं आते हैं--

वहीं आसमां पर हम से दूर

अपने लिए एक नया आशियाँ बनाते हैं--

और

अब वह साइबेरियन पंछी की तरह हैं


जो कुछ

पलों के लिये दूर से उड़कर कभी कभी आते हैं--

एक दो पल ठहर कर

जब तक हम अपने मन को तृप्त करने के लिए तैयार करते हैं

बस

हमारे अहसासों से अजनबी बन कर

फुर्र से फिर उड़ जाते हैं--

तुम जीवन के

इस सत्य को जितनी जल्दी समझ जाओगी--

अपनी जिंदगी का सफर उतनी आसानी से

काट पाओगी--

अब

अपने आंसुओं को व्यर्थ न बहने दो--

मेरे लिये आज भी हैं ये मोती की मानिंद

मेरी अंजुरी में ही रहने दो--

                             


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