जिंदगी - - दो शब्द
जिंदगी - - दो शब्द
सांझ की बेला में
चुपके चुपके अपने आंचल से आंखें पोंछकर
दरवाजे पर खड़ी राह निहारती
अपनी पत्नी के
कांधे पर रखते हुए कंपकंपाता हाथ
बुजुर्ग बोले--
तुम रोज सुबह - दोपहर और रात को
किसका करती हो इंतजार
यूं दरवाजा खोले--
उड़ने वाले पंछी
आकाश की ऊँचाइयों को छूने की चाहत में
उड़ कर वापिस नहीं आते हैं--
वहीं आसमां पर हम से दूर
अपने लिए एक नया आशियाँ बनाते हैं--
और
अब वह साइबेरियन पंछी की तरह हैं
जो कुछ
पलों के लिये दूर से उड़कर कभी कभी आते हैं--
एक दो पल ठहर कर
जब तक हम अपने मन को तृप्त करने के लिए तैयार करते हैं
बस
हमारे अहसासों से अजनबी बन कर
फुर्र से फिर उड़ जाते हैं--
तुम जीवन के
इस सत्य को जितनी जल्दी समझ जाओगी--
अपनी जिंदगी का सफर उतनी आसानी से
काट पाओगी--
अब
अपने आंसुओं को व्यर्थ न बहने दो--
मेरे लिये आज भी हैं ये मोती की मानिंद
मेरी अंजुरी में ही रहने दो--
