Click here to enter the darkness of a criminal mind. Use Coupon Code "GMSM100" & get Rs.100 OFF
Click here to enter the darkness of a criminal mind. Use Coupon Code "GMSM100" & get Rs.100 OFF

Shikha Pari

Tragedy Abstract


4.0  

Shikha Pari

Tragedy Abstract


मैरी विथ रेप

मैरी विथ रेप

1 min 610 1 min 610

ये बदन नहीं अब

तवायफ का कोठा सा

महसूस होता मुझे

बार बार बिना मन के ये

झुलसता है उस आग में

तुम्हारे प्यार करने के तरीके से

मैं वाकिफ़ नहीं हूँ।


मुझे ये हर रात बिस्तर पे

लौटना अच्छा नहीं लगता

तुम्हारे जिस्म से मेरे जिस्म तक

पहुँचते बहुत से तार

करंट जैसे छूते मुझे

उन तारों में उलझ जाती हूँ

फिर थक जाती हूँ।


कुछ कहने करने की

शक्ति बची नहीं होती

कौन सा तुम सुनने भी वाले हो

तुम्हें नशा सा होता है

मैं उस नशे से मुक्त

होने की राह देखती हूँ।


जब गूँजती है आवाज़ें तुम

मुँह मेरा दबा दिया करते हो

मुझे उस वक़्त कैद जैसा

पल महसूस होता है

मैं हारती नहीं

फिर भी ऊब ज़रूर जाती हूँ

तुम फिर भी लड़ते हो खुद से

मुझसे पूछते ही कहाँ हो।


तुम्हारी रात यूँ ही कट जाती है

मेरी चीखों से तुम्हें सुख मिलता है

ऐसा तुम कहते हो

मैं आश्चर्य से तुमको देखती हूँ।


Rate this content
Log in

More hindi poem from Shikha Pari

Similar hindi poem from Tragedy